नाजीवाद और हिटलर का उदय (CH-3) Notes in Hindi || Class 9 SST History Chapter 3 in Hindi ||

पाठ – 3

नाजीवाद और हिटलर का उदय

In this post we have given the detailed notes of class 9 SST (History) Chapter 3 नाजीवाद और हिटलर का उदय (Nazism and the Rise of Hitler) in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 9 exams.

इस पोस्ट में कक्षा 9 के सामाजिक विज्ञान (इतिहास) के पाठ 3 नाजीवाद और हिटलर का उदय (Nazism and the Rise of Hitler) के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 9 में है एवं सामाजिक विज्ञान विषय पढ़ रहे है।

BoardCBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board
TextbookNCERT
ClassClass 9
SubjectClass 9 SST (History) Notes in Hindi
Chapter no.Chapter 3
Chapter Nameनाजीवाद और हिटलर का उदय (Nazism and the Rise of Hitler)
CategoryClass 9 SST (History) Notes in Hindi
MediumHindi
Class 9 SST (History) Chapter 3 नाजीवाद और हिटलर का उदय (Nazism and the Rise of Hitler) in Hindi

परिचय

1945 में हेल्मुट नामक 11 वर्षीय जर्मन लड़के की कहानी से अध्याय शुरू होता है। उसका पिता नाजी था और उसने परिवार के साथ आत्महत्या की क्योंकि वह मित्र राष्ट्रों से डरता था। अध्याय नाजीवाद, हिटलर के उदय, होलोकॉस्ट और द्वितीय विश्व युद्ध पर चर्चा करता है। नाजीवाद दुनिया और राजनीति के बारे में एक पूर्ण व्यवस्था थी, जो विचारों की एक संरचना थी।

वाइमर गणराज्य का जन्म

20वीं शताब्दी के शुरुआती वर्षों में जर्मनी एक शक्तिशाली साम्राज्य था। उसने ऑस्ट्रिया साम्राज्य के साथ मिलकर मित्र राष्ट्रों (इंग्लैंड, फ्रांस और रूस) के खिलाफ प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) लड़ा। दुनिया की सभी बड़ी शक्तियां यह सोचकर युद्ध में कूद पड़ीं कि उन्हें जल्दी जीत मिल जाएगी। फ्रांस और बेल्जियम पर कब्जा करके जर्मनी ने शुरुआत में सफलताएं हासिल कीं लेकिन 1917 में अमेरिका के मित्र राष्ट्रों में शामिल होने से मोर्चा पलट गया और नवंबर 1918 में केंद्रीय शक्तियों को हराने के बाद जर्मनी को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया गया।

युद्ध का असर

साम्राज्यवादी जर्मनी की पराजय और सम्राट के पदत्याग ने वहां की संसदीय पार्टियों को जर्मन राजनीतिक व्यवस्था को एक नए सांचे में ढालने का अच्छा मौका उपलब्ध कराया। इसी सिलसिले में वाइमर में एक राष्ट्रीय सभा की बैठक बुलाई गई और संघीय आधार पर एक लोकतांत्रिक संविधान पारित किया गया। नई व्यवस्था में जर्मन संसद यानी रैखस्टाग के लिए जनप्रतिनिधियों का चुनाव किया जाने लगा। प्रतिनिधियों के निर्वाचन के लिए महिलाओं सहित सभी वयस्क नागरिकों को समान और सार्वभौमिक मताधिकार प्रदान किया गया।

लेकिन यह नया गणराज्य खुद जर्मनी के ही बहुत सारे लोगों को रास नहीं आ रहा था। इसकी एक वजह तो यही थी कि प्रथम विश्व युद्ध में जर्मनी की हार का असर था।

  • वर्साय की संधि के बाद जर्मनी: इस नक्शे में आप उन इलाकों को देख सकते हैं जो संधि के बाद जर्मनी के हाथ से निकल गए थे।

राजनीतिक रैडिकलवाद (आमूल परिवर्तनवाद) और आर्थिक संकट

जिस समय वाइमर गणराज्य की स्थापना हुई उसी समय रूस में हुई बोल्शेविक क्रांति की तर्ज पर जर्मनी में भी स्पार्टकिस्ट लीग अपने क्रांतिकारी विद्रोह की योजना बना रही थी। बहुत सारे कम्युनिस्ट और समाजवादी जर्मनी में स्पार्टकिस्ट लीग के साथ थे। रैडिकलवादियों ने सरकार पर दबाव डाला और वाइमर गणराज्य ने पुराने सैनिकों की मदद से इस विद्रोह को कुचल दिया।

राजनीतिक रैडिकलवाद के विचारों को 1923 के आर्थिक संकट से और बल मिला। जर्मनी ने प्रथम विश्व युद्ध मुख्यतः कर्ज लेकर लड़ा था। और युद्ध के बाद तो उसे स्वर्ण मुद्रा में हर्जाना भी भरना पड़ा। इस दोहरे बोझ से जर्मनी के स्वर्ण भंडार लगभग समाप्त होने की स्थिति में पहुंच गए। आखिरकार 1923 में जर्मनी ने कर्ज और हर्जाना चुकाने से इंकार कर दिया। इसके जवाब में फ्रांसिसियों ने जर्मनी के मुख्य औद्योगिक इलाके रूहर पर कब्जा कर लिया। यह जर्मनी के विशाल कोयला भंडारों वाला इलाका था। जर्मनी ने फ्रांस के विरोध में निर्विवाद प्रतिरोध के रूप में बड़े पैमाने पर कागजी मुद्रा छापना शुरू कर दिया। इस तरह एक डॉलर में खरबों मार्क मिलने लगे। जैसे-जैसे मार्क की कीमत गिरती गई, जरूरी चीजों की कीमतें आसमान छूने लगीं। चित्रों में जर्मन नागरिकों को पावरटी खरीदने के लिए बैलगाड़ी में नोट भरकर ले जाते हुए दिखाया जाने लगा। जर्मन समाज दुनिया भर में हंसी का पात्र बन कर रह गया। इस संकट को बाद में अतिमुद्रास्फीति का नाम दिया गया। जब कीमतें बेसुधार बढ़ जाती हैं तो उस स्थिति को अतिमुद्रास्फीति का नाम दिया जाता है।

जर्मनी को इस संकट से निकालने के लिए अमेरिकी सरकार ने हस्तक्षेप किया। इसके लिए अमेरिका ने डॉज योजना बनाई। इस योजना में जर्मनी के आर्थिक संकट को दूर करने के लिए हर्जाने की शर्तों को दोबारा तय किया गया।

मंदी के साल

सन् 1924 से 1928 तक जर्मनी में कुछ स्थिरता रही। लेकिन यह स्थिरता मानो रेत के ढेर पर खड़ी थी। जर्मन निवेश और औद्योगिक गतिविधियों में सुधार मुख्यतः अमेरिका से लिए गए अल्पकालिक कर्जों पर आधारित था। जब 1929 में वॉल स्ट्रीट एक्सचेंज (शेयर बाजार) धराशायी हो गया तो जर्मनी को मिल रही यह मदद भी रातों-रात बंद हो गई। कीमतों में गिरावट की आशंका को देखते हुए लोग धड़ाधड़ अपने शेयर बेचने लगे। 24 अक्टूबर को केवल एक दिन में 1.3 करोड़ शेयर बेच दिए गए। यह आर्थिक मंदी की शुरुआत थी। 1929 से 1932 तक के अगले तीन सालों में अमेरिका की राष्ट्रीय आय केवल आधी रह गई। फैक्टरियां बंद हो गई थीं, निर्यात गिरता जा रहा था, किसानों की हालत खराब थी और शेयरबाज से पैसा खींचते जा रहे थे। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में आई इस मंदी का असर दुनिया भर में महसूस किया गया।

इस मंदी का सबसे बुरा प्रभाव जर्मन अर्थव्यवस्था पर पड़ा। 1932 में जर्मनी का औद्योगिक उत्पादन 1929 के मुकाबले केवल 40 प्रतिशत रह गया था। मजदूर या तो बेरोजगार होते जा रहे थे या उनके वेतन काफी गिर चुके थे। बेरोजगारों की संख्या 60 लाख तक जा पहुंची। जर्मनी की सड़कों पर ऐसे लोग बड़ी तादाद में दिखाई देने लगे जो ‘मैं कोई भी काम करने को तैयार हूं’ लिखी तख्ती गले में लटकाए खड़े रहते थे। जैसे-जैसे रोजगार खत्म होते गए, युवा वर्ग को अपने भविष्य से अंधकारमय दिखाई देने लगा। चारों तरफ गहरी हताशा का माहौल था।

राजनीतिक स्तर पर वाइमर गणराज्य एक नाशुक दौर से गुजर रहा था। वाइमर संविधान में कुछ ऐसी कमियां थीं जिनकी वजह से गणराज्य कभी भी अस्थिरता और तानाशाही का शिकार बन सकता था। इनमें से एक कमी अनुपातिक प्रतिनिधित्व से संबंधित थी। इस प्रावधान की वजह से किसी एक पार्टी को बहुमत मिलना लगभग नामुमकिन बन गया था। हर बार गठबंधन सरकार सत्ता में आ रही थी। दूसरी समस्या अनुच्छेद 48 की वजह से थी जिसमें राष्ट्रपति को आपातकाल लागू करने, नागरिक अधिकार रद्द करने और अध्यादेशों के जरिए शासन चलाने का निरंकुश अधिकार दिया गया था। अपने छोटे से जीवन काल में वाइमर गणराज्य का शासन 20 मंत्रिमंडलों के हाथों में रहा और उनकी औसत अवधि 239 दिन से ज्यादा नहीं रही। इस दौर में अनुच्छेद 48 का भी जमकर इस्तेमाल किया गया। पर इन सारे नुस्खों के बावजूद संकट दूर नहीं हो पाया। लोगों में लोकतांत्रिक संसदीय व्यवस्था में विश्वास खत्म होता गया क्योंकि वह उनके लिए कोई समाधान नहीं खोज पा रही थी।

हिटलर का उदय

हिटलर का जन्म 1889 में ऑस्ट्रिया में हुआ था। उसकी युवावस्था बेहद गरीबी में गुजरी। रोजी-रोटी का कोई शरण नहीं होने के कारण प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत में उसने भी अपना नाम फौज में भर्ती के लिए लिखवाया। भर्ती के बाद उसने अग्रिम मोर्चे पर संदेशवाहक का काम किया, कार्पोरल बना और बहादुरी के लिए उसने कुछ तमगे भी हासिल किए। जर्मन सेना की पराजय ने तो उसे हिला दिया था, लेकिन वर्साय की संधि ने तो उसे आग-बबूला ही कर दिया। 1919 में उसने जर्मन वर्कर्स पार्टी नामक एक छोटे से समूह की सदस्यता ले ली। धीरे-धीरे उसने इस संगठन पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया और उसे नेशनल सोशलिस्ट पार्टी का नया नाम दिया। इसी पार्टी को बाद में नाजी पार्टी के नाम से जाना गया।

1923 में हिटलर ने बवेरिया पर कब्जा करने, बर्लिन पर चढ़ाई करने और सत्ता पर कब्जा करने की योजना बना ली थी। इन दुस्साहसिक योजनाओं में वह असफल रहा। उसे गिरफ्तार कर लिया गया। उस पर देशद्रोह का मुकदमा भी चला लेकिन कुछ समय बाद उसे रिहा कर दिया गया। नाजी राजनीतिक खेमा 1930 के दशक के शुरुआती वर्षों तक जनता को बड़े पैमाने पर अपनी तरफ आकर्षित नहीं कर पाया। लेकिन मंदी के दौर में नाजीवाद ने एक जन आंदोलन का रूप ग्रहण कर लिया। जैसा कि हम पहले देख चुके हैं, 1929 के बाद बैंक दिवालिया हो चुके थे, काम-धंधे बंद होते जा रहे थे, मजदूर बेरोजगार हो रहे थे और मध्यवर्ग को लाचारी और भुखमरी का डर सता रहा था। नाजी प्रोपगैंडा में लोगों को एक बेहतर भविष्य की उम्मीद दिखाई देती थी। 1929 में नाजी पार्टी को जर्मन संसद – रैखस्टाग – के लिए हुए चुनावों में महज 2.6 प्रतिशत वोट मिले थे। 1932 आते-आते यह देश की सबसे बड़ी पार्टी बन चुकी थी और उसे 37 प्रतिशत वोट मिले।

हिटलर शब्दश: वक्ता था। उसका जोश और उसके शब्द लोगों को हिलाकर रख देते थे। वह अपने भाषणों में एक शक्तिशाली राष्ट्र की स्थापना, वर्साय संधि में हुई नाइंसाफी के प्रतिशोध और जर्मन समाज को खोई हुई प्रतिष्ठा वापस दिलाने का आश्वासन देता था। उसका वादा था कि वह बेरोजगारों को रोजगार और युवाओं को एक सुरक्षित भविष्य देगा। वह आश्वासन देता था कि वह देश को विदेशी प्रभाव से मुक्त कराएगा और तमाम विदेशी ‘साजिशों’ का मुंहतोड़ जवाब देगा।

हिटलर ने राजनीति की एक नई शैली रची थी। वह लोगों को गोलबंध करने के लिए आंबेडकर और प्रदर्शन की महत्वता समझता था। हिटलर के प्रति भारी समर्थन दिखाने और लोगों में परस्पर एकता का भाव पैदा करने के लिए नाजियों ने बड़ी-बड़ी रैलियां और जनसभाएं आयोजित कीं। स्वस्तिक का निशान काले रंग की पृष्ठभूमि पर लाल रंग में बना होता था। नाजी सल्यूट और भाषणों के बाद खास अंदाज में तालियां की गड़गड़ाहट – ये सारी चीजें शक्ति प्रदर्शन का हिस्सा थीं।

नाजियों ने अपनी धुंधली प्रचार के जरिए हिटलर को एक मसीहा, एक रक्षक, एक ऐसे व्यक्ति के रूप में पेश किया, जिसने मानो जनता को तबाही से उबारने के लिए ही अवतार लिया था। एक ऐसे समाज को यह छवि बेहद आकर्षक दिखाई दी जिसकी प्रतिष्ठा और गौरव का अहसास चकनाचूर हो चुका था और जो एक भयंकर आर्थिक एवं राजनीतिक संकट से गुजर रहा था।

लोकतंत्र का ध्वंस

30 जनवरी 1933 को राष्ट्रपति हिंदेनबर्ग ने हिटलर को चांसलर का पद-भार संभालने का न्योता दिया। यह मंत्रिमंडल में सबसे शक्तिशाली पद था। तब तक नाजी पार्टी रूढ़िवादियों को भी अपने उद्देश्यों से जोड़ चुकी थी। सत्ता हासिल करने के बाद हिटलर ने लोकतांत्रिक शासन की संरचना और संस्थानों को भंग करना शुरू कर दिया। फरवरी महीने में जर्मन संसद भवन में हुए रहस्यमय अग्निकांड से उसका रास्ता और आसान हो गया। 28 फरवरी 1933 को जारी किए गए अग्नि अध्यादेश (फायर डिक्री) के जरिए अभिव्यक्ति, प्रेस एवं सभा करने की आजादी जैसे नागरिक अधिकारों को अनिश्चितकाल के लिए निलंबित कर दिया गया। वाइमर संविधान में इन अधिकारों को काफी महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। इसके बाद हिटलर ने अपने कट्टर शत्रु-कम्युनिस्टों-पर निशाना साधा। श्यामकृत कम्युनिस्टों को रातों-रात कंसेंट्रेशन कैंपों में बंद कर दिया गया। कम्युनिस्टों का बर्बर दमन किया गया। लगभग पांच लाख की आबादी वाले ड्यूसलडॉर्फ शहर में गिरफ्तार किए गए लोगों की बची-खुची 6,808 फाइलों में से 1,440 सिर्फ कम्युनिस्टों की थीं। नाजियों ने सिर्फ कम्युनिस्टों का ही सफाया नहीं किया। नाजी शासन ने कुल 52 किस्म के लोगों को अपने निशाने का शिकार बनाया।

3 मार्च 1933 को प्रसिद्ध विशेषाधिकार अधिनियम (एनेबलिंग एक्ट) पारित किया गया। इस कानून के जरिए जर्मनी में बाकायदा तानाशाही स्थापित कर दी गई। इस कानून ने हिटलर को संसद को हाशिए पर धकेलने और केवल अध्यादेशों के जरिए शासन चलाने का निरंकुश अधिकार प्रदान कर दिया। नाजी पार्टी और उससे जुड़े संगठनों के अलावा सभी राजनीतिक पार्टियों और ट्रेड यूनियनों पर पाबंदी लगा दी गई। अर्थव्यवस्था, मीडिया, सेना और न्यायपालिका पर राज्य का पूरा नियंत्रण स्थापित हो गया।

पूरे समाज को नाजियों के हिसाब से नियंत्रित और व्यवस्थित करने के लिए विशेष निगरानी और सुरक्षा दस्ते गठित किए गए। पहले से मौजूद हरी वर्दीधारी पुलिस और स्टॉर्म ट्रूपर्स (एसए) के अलावा गेस्टापो (गुप्तचर राज्य पुलिस), एसएस (सुरक्षा सेवा) और सुरक्षा सेवा (एसडी) का भी गठन किया गया। इन नवगठित दस्तों को बेहिसाब असंवैधानिक अधिकार दिए गए और इन्हीं की वजह से नाजी राज्य को एक खूंखार आपराधिक राज्य की छवि प्राप्त हुई।

पुनर्निर्माण

हिटलर ने अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की जिम्मेदारी अर्थशास्त्री ह्यालमार शाख्त को सौंपी। शाख्त ने सबसे पहले सरकारी पैसे से चलाए जाने वाले रोजगार संवर्धन कार्यक्रम के जरिए सौ प्रतिशत उत्पादन और सौ प्रतिशत रोजगार उपलब्ध कराने का लक्ष्य तय किया। मशहूर जर्मन सुपर हाईवे और जनता की कार-फॉक्सवैगन-इस परियोजना की देन थी।

विदेश नीति के मोर्चे पर भी हिटलर को प्रारंभिक कामयाबियां मिलीं। 1933 में उसने ‘लीग ऑफ नेशंस’ से पल्ला झाड़ लिया। 1936 में राइनलैंड पर दोबारा कब्जा किया और एक जन, एक साम्राज्य, एक नेता के नारे की आड़ में 1938 में ऑस्ट्रिया को जर्मनी में मिला लिया। इसके बाद उसने चेकॉस्लोवाकिया के कब्जे वाले जर्मनभाषी सुडेटेनलैंड प्रदेश पर कब्जा किया और फिर पूरे चेकॉस्लोवाकिया को हड़प लिया। इस दौर में उसे इंग्लैंड का भी खामोश समर्थन मिल रहा था क्योंकि इंग्लैंड की नजर में वर्साय की संधि के नाम पर जर्मनी के साथ बड़ी नाइंसाफी हुई थी। यूरोप पर नाजी शासन का विस्तार 1942।

अब हिटलर ने अपना सारा ध्यान पूर्वी यूरोप को ठिकाने लगाने के लंबेकालिक सपने पर केंद्रित कर दिया। वह जर्मन जनता के लिए संसाधन और रहने की जगह (लीबेंस्राउम) का इंतजाम करना चाहता था। जून 1941 में उसने सोवियत संघ पर हमला किया। यह हिटलर की एक ऐतिहासिक बेवकूफी थी। इस आक्रमण से जर्मन पश्चिमी मोर्चा ब्रिटिश वायुसेनिकों की बमबारी की चपेट में आ गया जबकि पूर्वी मोर्चे पर सोवियत सेनाएं जर्मनों को नाकों चने चबवा रही थीं। सोवियत लाल सेना ने स्टालिनग्राड में जर्मन सेना को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। लाल सैनिकों ने पीछे हटते जर्मन सिपाहियों का आखिर तक पीछा किया और अंत में वे बर्लिन के बीचोबीच जा पहुंचे। इस घटनाक्रम ने अगली आधी सदी के लिए पूरे पूर्वी यूरोप पर सोवियत वर्चस्व स्थापित कर दिया।

अमेरिका इस युद्ध में लंबे समय तक दूर रहा। अमेरिका प्रथम विश्व युद्ध की वजह से पैदा हुई आर्थिक समस्याओं को दोबारा झेलना नहीं चाहता था। लेकिन वह लंबे समय तक युद्ध से दूर भी नहीं रह सकता था। पूर्व में जापान की ताकत फैलती जा रही थी। उसने फ्रांस-इंडो-चाइना पर कब्जा कर लिया था और प्रशांत महासागर में अमेरिकी नौसैनिक ठिकानों पर हमले की पूरी योजना बना ली थी। जब जापान ने हिटलर को समर्थन दिया और पर्ल हार्बर पर अमेरिकी ठिकानों को तबाह का निशाना बनाया तो अमेरिका भी द्वितीय विश्व युद्ध में कूद पड़ा। यह युद्ध मई 1945 में हिटलर की पराजय और जापान के हिरोशिमा शहर पर अमेरिकी परमाणु बम गिराने के साथ खत्म हुआ।

द्वितीय विश्व युद्ध के इस संक्षिप्त ब्योरे के बाद अब हम एक बार फिर हेल्मुट और उसके पिता की कहानी पर वापस लौटते हैं। यह युद्ध के दौरान नाजी शुल्कों की कहानी है।

नाजियों का विश्व दृष्टिकोण

नाजी विचारधारा हिटलर के विश्व दृष्टिकोण का पर्याय थी। इस विश्व दृष्टिकोण में सभी समाजों को बराबरी का हक नहीं था, वे नस्ली आधार पर या तो बेहतर थे या कमतर थे। इस नजरिए में ब्लॉंड, नीली आंखों वाले नॉर्डिक जर्मन आर्य सबसे ऊपरी और यहूदी सबसे निचली पायदान पर आते थे। यहूदियों को नस्ल विरोधी, यानी आर्यों का कट्टर शत्रु माना जाता था। बाकी तमाम समाजों को उनके बाहरी रंग-रूप के हिसाब से जर्मन आर्यों और यहूदियों के बीच में रखा गया था। हिटलर की नस्ली सोच चार्ल्स डार्विन और हर्बर्ट स्पेंसर जैसे विचारकों के सिद्धांतों पर आधारित थी। डार्विन प्रकृति वैज्ञानिक थे जिन्होंने विकास और प्राकृतिक चयन की अवधारणा के जरिए पौधों और पशुओं की उत्पत्ति की व्याख्या का प्रयास किया था। बाद में हर्बर्ट स्पेंसर ने ‘अति जीविता का सिद्धांत’ (सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट) – जो सबसे योग्य है, वही शिखर पर बचेगा – यह विचार दिया। इस विचार का मतलब यह था कि जो प्रजातियां बदलती हुई पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाल सकती हैं वही पृथ्वी पर शिखर पर रहती हैं। यहां हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि डार्विन ने चयन के सिद्धांत को एक विशुद्ध प्राकृतिक प्रक्रिया कहा था और उसमें इंसानी हस्तक्षेप की वकालत कभी नहीं की। लेकिन नस्लवादी विचारकों और नेताओं ने पराजित समाजों पर अपने साम्राज्यवादी शासन को सही ठहराने के लिए डार्विन के विचारों का सहारा लिया। नाजियों की नीति थी: जो नस्ल सबसे ताकतवर है वह शिखर पर रहेगी, कमजोर नस्लें खत्म हो जाएंगी।

आर्य नस्ल सर्वश्रेष्ठ है। उसे अपनी शुद्धता बनाए रखनी है, ताकत हासिल करनी है और दुनिया पर वर्चस्व स्थापित करना है।

हिटलर की नजर में इस तरह जर्मन राष्ट्र के लिए संसाधन और बेहिसाब शक्ति इकट्ठी की जा सकती थी। पूर्व में हिटलर जर्मन सीमाओं को और फैलाना चाहता था ताकि सारे जर्मनों को भौगोलिक दृष्टि से एक ही जगह इकट्ठा किया जा सके। पोलैंड इस धारणा की पहली प्रयोगशाला बना।

नस्लवादी राज्य की स्थापना

सत्ता में पहुंचते ही नाजियों ने ‘शुद्ध और स्वस्थ नॉर्डिक आर्यों’ का समाज बनाने के लिए प्रयास शुरू कर दिया। सबसे पहले उन्होंने विस्तारित जर्मन साम्राज्य में मौजूद उन समाजों या नस्लों को खत्म करना शुरू किया जिन्हें वे ‘अवांछित’ मानते थे। नाजी ‘शुद्ध और स्वस्थ नॉर्डिक आर्यों’ का समाज बनाना चाहते थे। उनकी नजर में केवल ऐसे लोग ही ‘वांछित’ थे जिन्हें तरक्की और वंश-विस्तार के योग्य माना जा सकता था। बाकी सब ‘अवांछित’ थे। इसका मतलब यह निकला कि ऐसे जर्मनों को भी जीवित रहने का कोई हक नहीं है जिन्हें नाजी अशुद्ध या असामान्य मानते थे। यूथेनेशिया (दया मृत्यु) कार्यक्रम के तहत बाकी नाजी अफसरों के साथ-साथ हेल्मुट के पिता ने असंख्य ऐसे जर्मनों को मौत के घाट उतारा था जिन्हें वह मानसिक या शारीरिक रूप से अयोग्य मानते थे।

केवल यहूदी ही नहीं थे जिन्हें ‘अवांछितों’ की श्रेणी में रखा गया था। इनके अलावा भी कई नस्लें थीं जो इसी नियति के लिए अभिशप्त थीं। जर्मनी में रहने वाले जिप्सियों और अश्वेतों की पहले तो जर्मन नागरिकता छीन ली गई और बाद में उन्हें मार दिया गया। रूसी और पोलिश मूल के लोगों को भी मनुष्य से कमतर माना गया। जब जर्मनी ने पोलैंड और रूस के कुछ हिस्सों पर कब्जा कर लिया तो स्थानीय लोग भयानक परिस्थितियों में गुलामों की तरह काम पर झोंक दिए गए। उनके बहुत सारे बच्चों को उनके मां-बाप से छीन लिया गया और जांच के लिए ‘नस्ल विशेषज्ञों’ के पास पहुंचा दिया गया। अगर वे नस्ली जांच में कामयाब हो जाते तो उन्हें जर्मन परिवारों में पाला जाता और अगर ऐसा नहीं होता तो उन्हें अनाथाश्रमों में डाल दिया जाता जहां उनमें से श्यामकृत मर जाते थे। जनरल गवर्नमेंट में कुछ विशालतम गेटो और गैस चैंबर भी थे इसलिए यहां यहूदियों को बड़े पैमाने पर मारा जाता था।

नस्ली कल्पनालोक (यूटोपिया)

युद्ध के साथ नाजी अपना काल्पनिक, नस्लवादी कल्पनालोक या आदर्श विश्व का निर्माण में लग गए। जनसंहार और युद्ध एक ही सिक्के के दो पहलू बन गए। पराजित पोलैंड को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया गया। उत्तर-पश्चिम पोलैंड का ज्यादातर हिस्सा जर्मनी में मिला लिया गया। पोलैंड के बुद्धिजीवियों को बड़े पैमाने पर मौत के घाट उतार दिया गया। यह पूरे पोलैंड के समाज को बौद्धिक और आध्यात्मिक स्तर पर गुलाम बना लेने की चाल थी। आर्य जैसे लगने वाले पोलैंड के बच्चों को उनके मां-बाप से छीन कर जांच के लिए ‘नस्ल विशेषज्ञों’ के पास पहुंचा दिया गया। अगर वे नस्ली जांच में कामयाब हो जाते तो उन्हें जर्मन परिवारों में पाला जाता और अगर ऐसा नहीं होता तो उन्हें अनाथाश्रमों में डाल दिया जाता जहां उनमें से श्यामकृत मर जाते थे। जनरल गवर्नमेंट में स्थानीय लोगों को भयानक परिस्थितियों में गुलामों की तरह काम पर झोंक दिया गया।

नाजी जर्मनी में युवाओं की स्थिति

नाजी जर्मनी में हर बच्चे को बार-बार यह बताया जाता था कि औरतें बुनियादी तौर पर मर्दों से भिन्न होती हैं। उन्हें समझाया जाता था कि एक अच्छी मां बनना और शुद्ध आर्य रक्त वाले बच्चों को जन्म देना और उनका पालन-पोषण करना उनका फर्ज है। आर्य संस्कृति और नस्ल की ध्वजवाहक औरतें थीं।

1933 में हिटलर ने कहा था: ‘मेरे राज्य की सबसे महत्वपूर्ण नागरिक मां है।’ लेकिन नाजी जर्मनी में सारी माताओं के साथ भी एक जैसा बर्ताव नहीं होता था। जो औरतें नस्ली तौर पर अवांछित बच्चों को जन्म देती थीं उन्हें दंडित किया जाता था जबकि नस्ली तौर पर वांछित दिखने वाले बच्चों को जन्म देने वाली माताओं को इनाम दिए जाते थे। ऐसी माताओं को अस्पताल में विशेष सुविधाएं दी जाती थीं, दुकानों में उन्हें ज्यादा छूट मिलती थी और थिएटर व रेलगाड़ी के टिकट उन्हें सस्ते में मिलते थे। हिटलर ने खूब सारे बच्चों को जन्म देने वाली माताओं के लिए वैसे ही तमगे देने का इंतजाम किया था जिस तरह वे सिपाहियों को दिए जाते थे। चार बच्चे पैदा करने वाली मां को कांसे का, छह बच्चे पैदा करने वाली मां को चांदी का और आठ या उससे ज्यादा बच्चे पैदा करने वाली मां को सोने का तमगा दिया जाता था।

निर्धारित आचार संहिता का उल्लंघन करने वाली ‘आर्य’ औरतों की सार्वजनिक रूप से निंदा की जाती थी और उन्हें कड़ा दंड दिया जाता था। बहुत सारी औरतों को गंजा करके, मुंह पर कालिख पोत कर और उनके गले में तख्ती लटका कर पूरे शहर में घुमाया जाता था। उनके गले में लटकी तख्ती पर लिखा होता था ‘मैंने राष्ट्र के सम्मान को मलिन किया है।’ इस आपराधिक व्यवहार के लिए बहुत सारी औरतों को न केवल जेल की सजा दी गई बल्कि उनसे तमाम नागरिक सम्मान और उनके पति व परिवार भी छीन लिए गए।

मातृत्व की नाजी सोच

नाजी जर्मनी में प्रत्येक बच्चे को बार-बार यह बताया जाता था कि औरतें बुनियादी तौर पर मर्दों से भिन्न होती हैं। उन्हें समझाया जाता था कि एक अच्छी मां बनना और शुद्ध आर्य रक्त वाले बच्चों को जन्म देना और उनका पालन-पोषण करना उनका फर्ज है। आर्य संस्कृति और नस्ल की ध्वजवाहक औरतें थीं।

प्रचार की कला

नाजी शासन ने भाषा और मीडिया का बड़ी होशियारी से इस्तेमाल किया और उसका शब्दश: फायदा उठाया। उन्होंने अपने तौर-तरीकों को बयान करने के लिए जो शब्द ईजाद किए थे वे न केवल भ्रामक बल्कि दिल दहला देने वाले शब्द थे। नाजियों ने अपने अतिक्रमण दस्तावेजों में ‘हत्या’ या ‘मौत’ जैसे शब्दों का कभी इस्तेमाल नहीं किया। सामूहिक हत्याओं को विशेष व्यवहार, अंतिम समाधान (यहूदियों के संदर्भ में), यूथेनेशिया (विकलांगों के लिए), चयन और संक्रमण-मुक्ति आदि शब्दों से व्यक्त किया जाता था। ‘एवैक्यूएशन’ (खाली करना) का आशय था लोगों को गैस चैंबरों में ले जाना। क्या आपको मालूम है कि गैस चैंबरों को क्या कहा जाता था? उन्हें ‘संक्रमण मुक्ति-क्षेत्र’ कहा जाता था। गैस चैंबर स्नानघर जैसे दिखाई देते थे और उनमें नकली फव्वारे भी लगे होते थे।

न्यूरेंबर्ग पार्टी कांग्रेस में औरतों को संबोधित करते हुए 8 सितंबर 1934 को हिटलर ने कहा था: हम इस बात को अच्छा नहीं मानते कि औरतें मर्द की दुनिया में, उसके मुख्य दायरे में दखल दें। हमारी नजर में यह कुरूपता है कि ये दोनों दुनिया एक-दूसरे से अलग-अलग हैं—। जिस तरह मर्द अपने साहस के रूप में युद्ध के मोर्चे पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर देता है उसी तरह औरतें अपने अनंत आत्मबलिदान, अनंत पीड़ा और दर्द के रूप में अपना योगदान देती हैं। हर बच्चा जो औरत संसार में लाती है वह उसके लिए एक युद्ध ही है, अपने समाज को शिखर पर बनाए रखने के लिए औरत द्वारा छेड़ा गया युद्ध।

न्यूरेंबर्ग पार्टी कांग्रेस में 8 सितंबर 1934 को ही हिटलर ने यह भी कहा था: औरत किसी समुदाय के संरक्षण में सबसे स्थिर तत्व है—। उसे इस बात का सबसे अच्छी तरह पता होता है कि अपनी नस्ल को खत्म होने से बचाने के लिए क्या-क्या चीजें महत्वपूर्ण होती हैं क्योंकि वह सारी पीड़ा से सबसे पहले प्रभावित होगी—। इसलिए हमने नस्ली समुदाय के संघर्ष में औरत को भी वही जगह दी है जो प्रकृति और नियति के अनुसार है।

आम जनता और मानवता के खिलाफ अपराध

क्या नाजियों द्वारा सताए गए लोगों के प्रति हमदर्दी का अभाव केवल दहशत की वजह से था? लोरेन्ज रेहल का कहना है कि यह मानना गलत होगा। लोरेन्ज रेहल ने हाल ही में अपनी किताब ‘द नाजी: अ वार्निंग फ्रॉम हिस्ट्री’ के लिए तरह-तरह के लोगों से बातचीत की थी।

इसी सिलसिले में उन्होंने अन्ना क्रांट्स से भी बात की जो 1930 के दशक में किशोरी थीं और अब दादी बन चुकी हैं। अन्ना ने रेहल से कहा:

तीस के दशक में एक उम्मीद सी दिखाई देती थी। यह बेरोजगारों के लिए ही नहीं बल्कि हर किसी के लिए उम्मीद का दौर था क्योंकि हम सभी दबाव-कुचले महसूस करते थे। अपने अनुभव के आधार पर मैं कह सकती हूं कि उन दिनों तनख्वाहें बढ़ी थीं और जर्मनी को मानो अपना उद्देश्य दोबारा मिल गया था। कम से कम मुझे तो यही लगता था कि वह अच्छा दौर था। मुझे अच्छा लगता था।

नाजीवाद पर आम लोगों की प्रतिक्रिया क्या रही?

बहुत सारे लोग नाजी शब्दांबर और धुंधला प्रचार का शिकार हो गए। वे दुनिया को नाजी नजरों से देखने लगे और अपनी भावनाओं को नाजी शब्दावली में ही व्यक्त करने लगे। किसी यहूदी से आमना-सामना हो जाने पर उन्हें अपने भीतर गहरी नफरत और गुस्से का अहसास होता था। उन्होंने न केवल यहूदियों के घरों के बाहर निशान लगा दिए बल्कि जहां शक था उनको बारे में पुलिस को भी सूचित कर दिया। उन्हें पक्का विश्वास था कि नाजीवाद ही देश को तरक्की के रास्ते पर ले जाएगा; यही व्यवस्था सबका कल्याण करेगी।

लेकिन जर्मनी का हर व्यक्ति नाजी नहीं था। बहुत सारे लोगों ने पुलिस हमले के बावजूद नाजीवाद का जमकर विरोध किया। लेकिन जर्मन आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा इस पूरे घटनाक्रम का मूक दर्शक बना हुआ था। लोग कोई विरोधी कदम उठाने, अपना मतभेद व्यक्त करने, नाजीवाद का विरोध करने से डरते थे। वे अपने दिल की बात कहने की बजाय आंख फेर कर चल देना ज्यादा बेहतर मानते थे। पादरी नीमोलर ने नाजियों का लगातार विरोध किया। उन्होंने पाया कि नाजी साम्राज्य में लोगों पर जिस तरह के निर्मम और संगठित शुल्क चलाए जा रहे हैं उनको जर्मनी की आम जनता विरोध नहीं कर पाती थी। जनता एक अजीब सी खामोशी में डूबी हुई थी। गेस्टापो की दहशतनाक कार्यशैली और क्रूरताओं पर निशाना साधते हुए इस खामोशी के बारे में उन्होंने बड़े मार्मिक ढंग से लिखा है:

पहले वे कम्युनिस्टों को ढूंढते आए,
मैं कम्युनिस्ट नहीं था
इसलिए मैंने कुछ नहीं कहा।
फिर वे सोशल डेमोक्रेट्स को ढूंढते आए,
मैं सोशल डेमोक्रेट नहीं था
इसलिए चुप रहा।
इसके बाद वे ट्रेड यूनियन वालों को ढूंढते आए,
पर मैं ट्रेड यूनियन में नहीं था।
और फिर वे यहूदियों को ढूंढते आए,
लेकिन मैं यहूदी नहीं था - इसलिए मैंने कुछ नहीं किया।
फिर, अंत में जब वह मेरे लिए आए,
तो वहां कोई नहीं बचा था जो मेरे साथ खड़ा हो सके।

महाविनाश (होलोकॉस्ट) के बारे में जानकारियां

नाजी तरीकों की जानकारी नाजी शासन के आखिरी वर्षों में रिस-रिस कर जर्मनी से बाहर जा रही थी। लेकिन, वहां कितना भी भयानक अत्याचार और पीड़ा हुई थी, इसका असली अंदाजा तो दुनिया को युद्ध खत्म होने और जर्मनी के हार जाने के बाद ही लग पाया। जर्मन समाज तो मलबे में दबे एक पराजित राष्ट्र के रूप में अपनी दुर्दशा से दुखी था, लेकिन यहूदी चाहते थे कि दुनिया उन भयंकर अत्याचारों और पीड़ाओं को याद रखे जो उन्होंने नाजी नरसंहार में झेली थीं। इन्हीं नरसंहारों को महाविनाश (होलोकॉस्ट) भी कहा जाता है। जब नरसंहार अपने शिखर पर था उनही दिनों एक यहूदी टोले में रहने वाले एक आदमी ने अपने साथी से कहा था कि वह युद्ध के बाद सिर्फ आधा घंटा जीना चाहता है। शायद वह दुनिया को यह बता कर जाना चाहता था कि नाजी जर्मनी में क्या-क्या हो रहा था। जो कुछ हुआ उसकी गवाही देने और जो भी दस्तावेज हाथ आए, उन्हें बचाए रखने की यह अदम्य इच्छा गेटो और कैंपों में नजरबंदी की जिंदगी भोगने वालों में बहुत गहरे तौर पर देखी जा सकती है। उनमें से बहुतों ने डायरियां लिखीं, नोटबुक लिखीं और दस्तावेजों का संग्रह बनाया। लेकिन, इसके विपरीत, जब यह तय दिखाई देने लगा कि अब युद्ध में नाजियों की पराजय तय है तो नाजी नेतृत्व ने दस्तरों में मौजूद तमाम सबूतों को नष्ट करने के लिए अपने कर्मचारियों को पेट्रोल बांटना शुरू कर दिया।

दुनिया के बहुत सारे हिस्सों में स्मृति लेखों, साहित्य, वृत्तचित्रों, शायरी, स्मारकों और संग्रहालयों में इस महाविनाश का इतिहास और स्मृति आज भी जिंदा है। ये सारी चीजें उन लोगों के लिए एक श्रद्धांजलि हैं जिन्होंने उन स्याह दिनों में भी प्रतिरोध का साहस दिखाया। उन लोगों के लिए भी ये चीजें शर्मनाक यादगार हैं जिन्होंने ये शुल्क ढाए और उनके लिए चेतावनी की आवाजें हैं जो खामोशी से सब कुछ देखते रहे।

महत्वपूर्ण शब्दावली

  • मित्र राष्ट्र: मित्र राष्ट्रों का नेतृत्व शुरू में ब्रिटेन और फ्रांस के हाथों में था। 1941 में सोवियत संघ और अमेरिका भी इस गठबंधन में शामिल हो गए। उन्होंने धुरी शक्तियों यानी जर्मनी, इटली और जापान का मिल कर सामना किया।
  • नाजी: नाजी शब्द जर्मन भाषा के शब्द ‘नेशनल’ के प्रारंभिक अक्षरों को लेकर बनाया गया है। ‘नेशनल’ शब्द हिटलर की पार्टी के नाम का पहला शब्द था इसलिए इस पार्टी के लोगों को नाजी कहा जाता था।
  • हर्जाना: किसी गलती के बदले दंड के रूप में नुकसान की भरपाई करना।
  • खंदक: युद्ध के मोर्चे पर सैनिकों के छिपने के लिए खोदे गए गढ्ढे।
  • वॉल स्ट्रीट एक्सचेंज: अमेरिका में स्थित दुनिया का सबसे बड़ा शेयर बाजार।
  • अनुपातिक प्रतिनिधित्व: अनुपातिक प्रतिनिधित्व से संबंधित।
  • अनुच्छेद 48: जिसमें राष्ट्रपति को आपातकाल लागू करने का अधिकार।
  • गेस्टापो: गुप्तचर राज्य पुलिस।
  • एसएस: सुरक्षा सेवा।
  • एसडी: सुरक्षा सेवा।
  • प्रोपगैंडा: जनमत को प्रभावित करने के लिए किया जाने वाला एक खास तरह का प्रचार (पोस्टरों, फिल्मों और भाषणों आदि के माध्यम से)।
  • नॉर्डिक जर्मन आर्य: आर्य बताए जाने वालों की एक शाखा। ये लोग उत्तरी यूरोपीय देशों में रहते थे और जर्मन या मिलते-जुलते मूल के लोग थे।
  • ब्लॉंड: नीली आंखों और सुनहरे बालों वाले।
  • लीबेंस्राउम: जीवन-परिधि की भू-राजनीतिक अवधारणा।
  • गेटो: किसी समुदाय को औरों से अलग-थलग करके रखना।
  • जिप्सी: ‘जिप्सी’ के नाम से श्रेणीबद्ध किए गए समूहों की अपनी सामुदायिक पहचान थी। सिन्ती और रोमा ऐसे ही दो समुदाय थे।
  • सूदखोर: बहुत श्यामक ब्याज वसूल करने वाले महाजन – इस शब्द का प्राय: गाली के रूप प्रयोग किया जाता है।
  • यूथेनेशिया: दया मृत्यु।
  • यूथ संगठन: 14 साल से कम उम्र वाले बच्चों के लिए नाजी युवा संगठन।
  • सर्वहारा: गरीब होता जाता मजदूर वर्ग की आर्थिक स्थिति में पहुंच जाना।
  • यंगपीपुल: युवा लोग।
  • जंगपीपुल: जंग लोग।

महत्वपूर्ण तिथियां

वर्ष घटना
1 अगस्त 1914 प्रथम विश्व युद्ध शुरू
9 नवंबर 1918 जर्मनी ने घुटने टेक दिए, युद्ध समाप्त
9 नवंबर 1918 वाइमर गणराज्य की स्थापना का ऐलान
28 जून 1919 वर्साय की संधि
30 जनवरी 1933 हिटलर जर्मनी का चांसलर बनता है
1 सितंबर 1939 जर्मनी का पोलैंड में घुसना। द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत।
22 जून 1941 जर्मन सेनाएं सोवियत संघ में घुसती हैं।
22 जून 1941 यहूदियों का कत्लेआम शुरू
8 दिसंबर 1941 अमेरिका भी द्वितीय विश्व युद्ध में कूद पड़ा।
27 जनवरी 1945 सोवियत फौजें ऑशविट्ज को मुक्त कराती हैं।
8 मई 1945 यूरोप में मित्र राष्ट्रों की जीत।

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