पाठ – 3
भूमंडलीकृत विश्व का बनना
In this post we have given the detailed notes of class 10 SST (History) Chapter 3 भूमंडलीकृत विश्व का बनना (The Making of a Global World) in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 10 exams.
इस पोस्ट में कक्षा 10 के सामाजिक विज्ञान (इतिहास) के पाठ 3 भूमंडलीकृत विश्व का बनना (The Making of a Global World) के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 10 में है एवं सामाजिक विज्ञान विषय पढ़ रहे है।
| Board | CBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board |
| Textbook | NCERT |
| Class | Class 10 |
| Subject | SST (History) |
| Chapter no. | Chapter 3 |
| Chapter Name | भूमंडलीकृत विश्व का बनना (The Making of a Global World) |
| Category | Class 10 SST (History) Notes in Hindi |
| Medium | Hindi |
आधुनिक युग से पहले
भूमंडलीकृत विश्व (वैश्वीकरण) के बनने की प्रक्रिया एक लंबा इतिहास रखती है, जिसमें व्यापार, लोगों के आवागमन (काम की तलाश में), पूँजी और वस्तुओं की वैश्विक आवाजाही शामिल है।
रेशम मार्ग (सिल्क रूट) से जुड़ती दुनिया
- परिचय: यह आधुनिक काल से पहले दुनिया के दूर-दूर स्थित भागों के बीच व्यापारिक और सांस्कृतिक संपर्कों का सबसे जीवंत उदाहरण है।
- मार्ग: जमीन या समुद्र से होकर गुज़रने वाले ये रास्ते एशिया को यूरोप और उत्तरी अफ्रीका से भी जोड़ते थे। ये ईसा पूर्व में अस्तित्व में आए और 15वीं शताब्दी तक मौजूद थे।
- व्यापारिक वस्तुएँ:
- पूर्व से पश्चिम: चीनी रेशम (सिल्क), चीनी पॉटरी, भारत व दक्षिण-पूर्व एशिया के कपड़े व मसाले।
- पश्चिम से पूर्व: सोने-चाँदी जैसी कीमती धातुएँ।
- सांस्कृतिक आदान-प्रदान: ईसाई मिशनरी, मुस्लिम धर्मोपदेशक और बौद्ध धर्म इसी मार्ग से दुनिया में फैला।
भोजन की यात्रा: स्पैघेत्ती और आलू
- खाद्य पदार्थों का प्रसार: व्यापारी और मुसाफिर जब भी किसी नए देश में जाते थे, अनजाने में वहाँ नई फसलों के बीज बो आते थे।
- उदाहरण: माना जाता है कि नूडल्स चीन से पश्चिम में पहुँचे और उन्हीं से स्पैघेत्ती का जन्म हुआ, या पास्ता अरब यात्रियों के साथ 5वीं सदी में सिसली (इटली) पहुँचा।
- अमेरिका से आगमन: आलू, सोया, मूँगफली, मक्का, टमाटर, मिर्च आदि खाद्य पदार्थ लगभग पाँच सौ साल पहले तक यूरोप और एशिया के पूर्वजों के पास नहीं थे। ये तब पहुँचे जब क्रिस्टोफर कोलंबस गलती से अमेरिका पहुँचा।
- आलू का प्रभाव: आलू के इस्तेमाल ने यूरोप के गरीबों की जिंदगी बदल दी, उनका भोजन बेहतर हुआ और औसत उम्र बढ़ने लगी।
- आयरिश आलू अकाल (1840 के दशक): किसी बीमारी के कारण आलू की फसल खराब होने पर लाखों लोग भुखमरी के कारण मारे गए, क्योंकि वे आलू पर अत्यधिक निर्भर थे।
विजय, बीमारी और व्यापार
16वीं सदी में यूरोपीय जहाज़ियों ने एशिया और अमेरिका तक का समुद्री रास्ता खोजा।
- अमेरिका का उपनिवेशीकरण: 16वीं सदी के मध्य तक पुर्तगाली और स्पेनिश सेनाओं ने अमेरिका को उपनिवेश बनाना शुरू कर दिया था।
- चाँदी का महत्व: आज के पेरू और मैक्सिको की खानों से निकलने वाली चाँदी ने यूरोप की संपदा को बढ़ाया और पश्चिम एशिया के साथ होने वाले व्यापार को गति दी।
- यूरोपीय जीत का हथियार – कीटाणु: स्पेनिश विजेताओं के सबसे शक्तिशाली हथियार सैनिक नहीं, बल्कि चेचक (Smallpox) जैसे कीटाणु थे।
- लाखों साल से अलग-थलग रहने के कारण अमेरिका के लोगों में इन बीमारियों से बचने की रोग प्रतिरोधी क्षमता नहीं थी।
- चेचक पूरे महाद्वीप में फैल गई और पूरे समुदायों को खत्म कर डाला, जिससे घुसपैठियों (यूरोपीय) की जीत का रास्ता आसान होता गया।
- व्यापार केंद्र में बदलाव:
- 18वीं सदी तक चीन और भारत दुनिया के सबसे धनी देशों में गिने जाते थे।
- 15वीं सदी से चीन ने बाहरी संबंध कम कर दिए और दुनिया से अलग-थलग पड़ने लगा।
- चीन की घटती भूमिका और अमेरिका के बढ़ते महत्व के चलते विश्व व्यापार का केंद्र पश्चिम की ओर खिसकने लगा, और यूरोप ही विश्व व्यापार का सबसे बड़ा केंद्र बन गया।
उन्नीसवीं शताब्दी (1815-1914)
उन्नीसवीं सदी में दुनिया तेजी से बदली। अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक विनिमय में तीन तरह की गतियों या ‘प्रवाहों’ का उल्लेख किया गया है:
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प्रवाह (Flow) |
विवरण |
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पहला प्रवाह |
व्यापार (Trade) का: मुख्य रूप से वस्तुओं (जैसे कपड़ा, गेहूँ) का व्यापार। |
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दूसरा प्रवाह |
श्रम (Labour) का: लोग काम या रोज़गार की तलाश में एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं। |
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तीसरा प्रवाह |
पूँजी (Capital) का: अल्प या दीर्घ अवधि के लिए दूर-दराज के इलाकों में निवेश। |
विश्व अर्थव्यवस्था का उदय
- ब्रिटेन में कॉर्न लॉ (Corn Law):
- 18वीं सदी के अंत में ब्रिटेन की आबादी बढ़ी, जिससे भोजन की माँग बढ़ी और कृषि उत्पाद महंगे हुए।
- बड़े भूस्वामियों के दबाव में सरकार ने मक्का के आयात पर पाबंदी लगा दी थी, जिसे कॉर्न लॉ कहा जाता था।
- खाद्य पदार्थों की ऊँची कीमतों से परेशान उद्योगपतियों और शहरी बाशिंदों के दबाव में कॉर्न लॉ समाप्त कर दिया गया।
- कॉर्न लॉ समाप्त होने का प्रभाव:
- बहुत कम कीमत पर खाद्य पदार्थों का आयात होने लगा।
- ब्रिटिश किसान आयातित माल की कीमत का मुक़ाबला नहीं कर पाए, खेती बंद हो गई और हज़ारों लोग बेरोज़गार हो गए।
- खाद्य पदार्थों की कीमतों में गिरावट से ब्रिटेन में उपभोग का स्तर बढ़ा।
- वैश्विक कृषि अर्थव्यवस्था का उदय (1890 तक):
- ब्रिटेन का पेट भरने के लिए पूर्वी यूरोप, रूस, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में ज़मीनों को साफ़ करके खेती की जाने लगी।
- खेतिहर इलाकों को बंदरगाहों से जोड़ने के लिए रेलवे का जाल बिछाया गया।
- पूँजी लंदन से आने लगी, और श्रम का प्रवाह अमेरिका व ऑस्ट्रेलिया जैसे स्थानों पर हुआ।
- 19वीं सदी में लगभग 5 करोड़ लोग यूरोप से अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में जाकर बस गए।
- पंजाब में नहर बस्ती (Canal Colony): ब्रिटिश भारतीय सरकार ने निर्यात के लिए गेहूँ और कपास की खेती के लिए अर्द्ध-रेगिस्तानी ज़मीनों को उपजाऊ बनाने हेतु नहरों का जाल बिछाया और यहाँ पंजाब के अन्य स्थानों के लोगों को लाकर बसाया।
तकनीक की भूमिका
- तकनीकी प्रगति: रेलवे, भाप के जहाज़, और टेलिग्राफ़ जैसे तकनीकी बदलावों ने उन्नीसवीं सदी के परिवर्तनों को संभव बनाया।
- मांस उत्पादों का व्यापार: 1870 के दशक तक, अमेरिका से यूरोप केवल ज़िंदा जानवर भेजे जाते थे, जो महंगे थे।
- रेफ्रिजरेशन तकनीक: पानी के जहाज़ों में रेफ्रिजरेशन (प्रशीतन) की तकनीक स्थापित की गई।
- परिवर्तन: जानवरों को यात्रा से पहले ही मारा जाने लगा, और केवल मांस ही यूरोप भेजा जाने लगा।
- परिणाम: समुद्री यात्रा का खर्च कम हुआ, यूरोप में मांस के दाम गिरे, और यूरोप के गरीबों को ज़्यादा विविधतापूर्ण खुराक मिली, जिससे जीवनस्थिति सुधरी।
उन्नीसवीं सदी के आखिर में उपनिवेशवाद
- अफ्रीका का बँटवारा:
- 1885 में यूरोप के ताकतवर देशों की बर्लिन में एक बैठक हुई।
- इस बैठक में अफ्रीका के नक़्शे पर सीधी लकीरें खींचकर, प्रतिद्वंद्वी यूरोपीय ताक़तों ने अपने-अपने इलाक़े आपस में बाँट लिए। नई औपनिवेशिक ताक़तें: ब्रिटेन और फ्रांस के अलावा, बेल्जियम, जर्मनी और 1890 के दशक के आखिर में संयुक्त राज्य अमेरिका भी औपनिवेशिक ताक़त बने।
रिंडरपेस्ट या मवेशी प्लेग
- रिंडरपेस्ट का आगमन (1880 का दशक): यह बीमारी पूर्वी अफ्रीका में एशियाई देशों से लाए गए बीमार जानवरों के ज़रिए पहुँची, जिनका उपयोग एरिट्रिया पर हमला कर रहे इतालवी सैनिकों का पेट भरने के लिए किया जाता था।
- विनाश: रिंडरपेस्ट जंगल की आग की तरह फैली और अपने रास्ते में आने वाले 90 प्रतिशत मवेशियों को मौत के घाट उतार दिया।
- अफ्रीकियों पर प्रभाव: पशुओं के खत्म हो जाने से अफ्रीकियों के रोजी-रोटी के साधन खत्म हो गए, क्योंकि अफ्रीका में जमीन की कमी नहीं थी, लेकिन वेतन पर काम करने का चलन नहीं था।
- यूरोपीय उपनिवेशकारों को लाभ: बचे-खुचे पशु भी यूरोपीय बागान मालिकों और औपनिवेशिक सरकारों के क़ब्ज़े में आ गए। इस घटना ने यूरोपीय उपनिवेशकारों को पूरे अफ्रीका को जीतने व गुलाम बना लेने का बेहतरीन मौक़ा दे दिया।
- मज़दूरों की भर्ती के लिए हथकंडे: अफ्रीकियों को श्रम बाज़ार में धकेलने के लिए उन पर भारी-भरकम कर लाद दिए गए और उत्तराधिकार कानून बदल दिए गए (केवल एक ही सदस्य को पैतृक संपत्ति)।
भारत से अनुबंधित श्रमिकों का जाना (गिरमिटिया मज़दूर)
- अनुबंध व्यवस्था: लाखों भारतीय और चीनी मज़दूरों को बागानों, खदानों और निर्माण परियोजनाओं में काम करने के लिए दूर-दूर के देशों में ले जाया जाता था।
- अनुबंध में शर्त थी कि 5 साल काम करने के बाद वे स्वदेश लौट सकते थे।
- उत्पत्ति के क्षेत्र: पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य भारत, और तमिलनाडु के सूखे इलाक़ों से। ये वे क्षेत्र थे जहाँ कुटीर उद्योग खत्म हो रहे थे और ज़मीन का भाड़ा बढ़ गया था।
- गंतव्य: कैरीबियाई द्वीप समूह (त्रिनिदाद, गुयाना, सूरीनाम), मॉरिशस, फिजी, सीलोन और मलाया।
- एजेंटों की भूमिका: एजेंटों को कमीशन मिलता था। वे श्रमिकों को फुसलाने के लिए झूठी जानकारियाँ देते थे, और कुछ मामलों में तो अपहरण भी कर लेते थे।
- ‘नई दास प्रथा’: बागानों में कठोर जीवन एवं कार्य स्थितियाँ होती थीं, और मज़दूरों के पास कानूनी अधिकार नहीं थे। इसलिए इस व्यवस्था को ‘नई दास प्रथा’ भी कहा गया।
- सांस्कृतिक मिश्रण: मज़दूरों ने जिंदगी बसर करने के अपने तरीके ढूँढ़े और पुरानी व नई संस्कृतियों का सम्मिश्रण किया।
- उदाहरण: त्रिनिदाद में मुहर्रम के जुलूस को विशाल उत्सवी मेले (‘होसे’) का रूप दिया गया, और ‘चटनी म्यूज़िक’ का उदय हुआ।
- समापन: बीसवीं सदी के शुरुआती सालों से राष्ट्रवादी नेताओं के विरोध के कारण, यह प्रथा 1921 में खत्म कर दी गई।
विदेश में भारतीय उद्यमी और व्यापार
- भारतीय साहूकार और महाजन: शिकारीपूरी श्रॉफ और नट्टूकोट्टई चेट्टियार मध्य एवं दक्षिण पूर्व एशिया में निर्यातोन्मुखी खेती के लिए कर्जे देते थे।
- हैदराबादी सिंधी व्यापारी: 1860 के दशक से दुनिया भर के बंदरगाहों पर अपने बड़े-बड़े एम्पोरियम खोल दिए, जो सैलानियों को स्थानीय और विदेशी चीजें बेचते थे।
- भारतीय व्यापार की प्रकृति में बदलाव:
- कपास का निर्यात: ब्रिटेन में औद्योगीकरण के बाद वहाँ के उद्योगपतियों के दबाव में आयातित कपड़ों पर सीमा शुल्क थोप दिए गए, जिससे महीन भारतीय कपास का आयात कम होने लगा।
- निर्यात का स्वरूप: निर्मित वस्तुओं (सूती कपड़े) का निर्यात घटने लगा, और कच्चे मालों (कच्ची कपास) का निर्यात बढ़ने लगा।
- नील और अफ़ीम: कपड़ों की रँगाई के लिए नील का और चीन को बड़ी मात्रा में अफ़ीम का निर्यात किया जाने लगा।
- व्यापार अधिशेष (Trade Surplus) और होम चार्जेज़:
- भारत के साथ ब्रिटेन हमेशा ‘व्यापार अधिशेष’ की अवस्था में रहता था (ब्रिटेन को हमेशा फ़ायदा)।
- ब्रिटेन इस मुनाफे के सहारे दूसरे देशों के साथ होने वाले व्यापारिक घाटे की भरपाई करता था (बहुपक्षीय बंदोबस्त)।
- इस अधिशेष का उपयोग तथाकथित ‘होम चार्जेज़’ (ब्रिटिश अफ़सरों द्वारा घर भेजी गई रकम, भारतीय बाहरी क़र्ज़ पर ब्याज, पेंशन) के निबटारे में होता था।
महायुद्धों के बीच अर्थव्यवस्था (1914-1945)
युद्धकालीन रूपांतरण (प्रथम विश्व युद्ध, 1914-1918)
- पहला आधुनिक औद्योगिक युद्ध: इसमें मशीनगनों, टैंकों, हवाई जहाज़ों और रासायनिक हथियारों का भयानक पैमाने पर इस्तेमाल हुआ।
- मानव सभ्यता पर प्रभाव: 90 लाख से ज्यादा लोग मारे गए और 2 करोड़ घायल हुए। इनमें ज्यादातर कामकाजी उम्र के लोग थे, जिससे यूरोप में कामकाज के लायक लोगों की संख्या बहुत कम रह गई।
- महिलाओं की भूमिका: मर्द मोर्चे पर गए, तो घर की औरतों को उन कामों को सँभालने के लिए बाहर आना पड़ा, जिन्हें अब तक केवल मर्दों का ही काम माना जाता था।
- आर्थिक शक्ति में बदलाव:
- युद्ध के लिए ब्रिटेन को अमेरिकी बैंकों और जनता से भारी क़र्ज़ा लेना पड़ा।
- परिणामस्वरूप, युद्ध के बाद अमेरिका क़र्ज़दार की बजाय कर्जदाता देश बन गया।
युद्धोत्तर सुधार
- ब्रिटेन का संकट: युद्ध के बाद ब्रिटेन को सबसे लंबा संकट झेलना पड़ा। उसे भारत और जापान में विकसित हो रहे उद्योगों से मुकाबला करना पड़ा और वह भारी विदेशी क़र्ज़ों में दब चुका था।
- बेरोज़गारी: युद्ध के कारण पैदा हुआ उछाह शांत होने पर उत्पादन गिरा और बेरोज़गारी बढ़ने लगी (1921 में हर पाँच में से एक ब्रिटिश मज़दूर के पास काम नहीं था)।
- कृषि क्षेत्र का संकट: युद्ध के कारण कनाडा, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में गेहूँ की पैदावार अचानक बढ़ी। युद्ध खत्म होने पर गेहूँ की अति के हालात पैदा हो गए, कीमतें गिर गईं, और किसान गहरे क़र्ज़ संकट में फँस गए।
बड़े पैमाने पर उत्पादन और उपभोग
- बृहत उत्पादन (Mass Production): 1920 के दशक की अमेरिकी अर्थव्यवस्था की विशेषता। कार निर्माता हेनरी फ़ोर्ड इसके विख्यात प्रणेता थे।
- असेंबली लाइन: हेनरी फ़ोर्ड ने शिकागो के बूचड़खाने की तर्ज़ पर डेट्रॉयट के अपने कारखाने में असेंबली लाइन स्थापित की।
- लाभ: काम की गति बढ़ाकर प्रत्येक मज़दूर की उत्पादकता बढ़ाने वाला तरीका था। हर तीन मिनट में एक कार (टी-मॉडल) तैयार होती थी।
- समस्या: मज़दूरों को थकान झेलनी पड़ी, और बहुतों ने काम छोड़ दिया।
- समाधान: फ़ोर्ड ने हताश होकर वेतन दोगुना (5 डॉलर प्रतिदिन) कर दिया और ट्रेड यूनियन गतिविधियों पर पाबंदी लगा दी।
- उपभोक्तावादी संपन्नता: बेहतर वेतन के चलते अब बहुत सारे मज़दूर भी कार, फ्रिज, वॉशिंग मशीन, रेडियो आदि टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुएँ खरीद सकते थे।
- हायर परचेज़ (Hire Purchase): ये वस्तुएँ क़र्ज़ पर खरीदी जाती थीं और कीमत साप्ताहिक या मासिक किस्तों में चुकाई जाती थी।
महामंदी (Great Depression)
- अवधि: 1929 से शुरू हुई और 1930 के दशक के मध्य तक बनी रही।
- प्रभाव: दुनिया के ज्यादातर हिस्सों के उत्पादन, रोज़गार, आय और व्यापार में भयानक गिरावट आई। कृषि क्षेत्रों और समुदायों पर इसका सबसे बुरा असर पड़ा।
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महामंदी के कारण |
व्याख्या |
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कृषि क्षेत्र में अति-उत्पादन |
कृषि उत्पादों की कीमतें गिरीं, जिससे किसान अपनी आय बनाए रखने के लिए और ज़्यादा उत्पादन करने लगे, जिससे कीमतें और नीचे चली गईं। |
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अमेरिकी क़र्ज़ का लौटना |
1920 के दशक में अमेरिका ने बहुत सारे देशों को क़र्ज़ दिया था। संकट का संकेत मिलते ही अमेरिकी उद्यमियों ने क़र्ज़ वसूली तेज़ कर दी, जिससे यूरोप में कई बैंक धराशायी हो गए। |
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अमेरिकी सरकार की नीतियाँ |
अमेरिका ने अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए आयातित पदार्थों पर दो गुना सीमा शुल्क वसूलना शुरू किया, जिसने विश्व व्यापार की कमर तोड़ दी। |
- अमेरिका पर सबसे बुरा असर: कीमतों में कमी और मंदी के कारण बैंकों ने घरेलू क़र्ज़ देना बंद कर दिया। निवेश से अपेक्षित लाभ न पा सकने के कारण हज़ारों बैंक दिवालिया हो गए (1933 तक 4,000 से ज़्यादा बैंक बंद)।
भारत और महामंदी
- व्यापार पर प्रभाव: 1928 से 1934 के बीच भारत के आयात-निर्यात घट कर लगभग आधे रह गए थे।
- कीमतों में गिरावट: गेहूँ की कीमत 50 प्रतिशत गिर गई। कृषि उत्पादों की कीमत तेजी से नीचे गिरी, लेकिन सरकार ने लगान वसूली में छूट देने से इनकार कर दिया।
- किसानों पर मार: सबसे बुरी मार उन काश्तकारों पर पड़ी जो विश्व बाज़ार के लिए उपज पैदा करते थे (जैसे: बंगाल के जूट उत्पादक, जिनके कच्चे पटसन की कीमतों में 60% से ज़्यादा गिरावट आई)। वे और क़र्ज़ में डूब गए।
- सोने का निर्यात: मंदी के इन्हीं सालों में भारत कीमती धातुओं, खासतौर से सोने का निर्यात करने लगा, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने में मदद मिली (कीन्स का मत)।
- राजनीतिक प्रभाव: 1931 में मंदी अपने चरम पर थी, और ग्रामीण भारत असंतोष में था। इसी समय महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया।
- शहरी भारत पर प्रभाव: शहरों में रहने वाले (निश्चित आय वाले) लोगों की हालत ठीक रही। राष्ट्रवादी खेमे के दबाव में उद्योगों की रक्षा के लिए सीमा शुल्क बढ़ाए गए, जिससे औद्योगिक क्षेत्र में निवेश में तेज़ी आई।
विश्व अर्थव्यवस्था का पुनर्निर्माण: युद्धोत्तर काल (1945 के बाद)
दूसरा विश्व युद्ध (1939-1945) धुरी शक्तियों (जर्मनी, जापान, इटली) और मित्र राष्ट्रों (ब्रिटेन, सोवियत संघ, फ्रांस, अमेरिका) के बीच लड़ा गया।
युद्धोत्तर बंदोबस्त और ब्रेटन वुड्स संस्थान
- सबक़: अर्थशास्त्रियों ने दो सबक़ सीखे:
- व्यापक उपभोग को बनाए रखने के लिए स्थिर आय और पूर्ण रोज़गार आवश्यक है, जिसके लिए सरकारी हस्तक्षेप ज़रूरी है।
- पूर्ण रोज़गार तभी हासिल किया जा सकता है जब सरकार के पास वस्तुओं, पूँजी और श्रम की आवाजाही को नियंत्रित करने की ताक़त हो।
- ब्रेटन वुड्स सम्मेलन (जुलाई 1944): अमेरिका स्थित न्यू हैम्पशर के ब्रेटन वुड्स नामक स्थान पर संयुक्त राष्ट्र मौद्रिक एवं वित्तीय सम्मेलन में युद्धोत्तर अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था पर सहमति बनी।
- ब्रेटन वुड्स संस्थान (जुड़वाँ संतानें):
- अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF): सदस्य देशों के विदेश व्यापार में लाभ और घाटे से निपटने के लिए।
- अंतर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं विकास बैंक (IRBD/विश्व बैंक): युद्धोत्तर पुनर्निर्माण के लिए पैसे का इंतज़ाम करने के लिए।
- ब्रेटन वुड्स व्यवस्था: यह निश्चित विनिमय दरों पर आधारित थी। डॉलर का मूल्य सोने से बँधा था (एक डॉलर = 35 औंस सोना)।
- नियंत्रण: इन संस्थानों की निर्णय प्रक्रिया पर पश्चिमी औद्योगिक देशों (विशेषकर अमेरिका, जिसे वीटो शक्ति प्राप्त थी) का नियंत्रण रहता है।
प्रारंभिक युद्धोत्तर वर्ष (1950-1970)
- तेज़ विकास: ब्रेटन वुड्स व्यवस्था ने पश्चिमी औद्योगिक राष्ट्रों और जापान के लिए व्यापार तथा आय में वृद्धि के एक अप्रतिम युग का सूत्रपात किया।
- विश्व व्यापार की विकास दर सालाना 8% से ज़्यादा रही।
- बेरोज़गारी औसतन 5% से भी कम रही।
- विकासशील देशों के प्रयास: विकासशील देश विकसित देशों के बराबर पहुँचने के लिए तकनीक से चलने वाले संयंत्रों के आयात पर बेहिसाब पूँजी का निवेश कर रहे थे।
अनौपनिवेशीकरण और स्वतंत्रता
- समस्याएँ: दूसरे विश्व युद्ध के बाद स्वतंत्र हुए एशिया और अफ्रीका के ज्यादातर देश गरीबी व संसाधनों की कमी से जूझ रहे थे।
- NIEO (नयी अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक प्रणाली): IMF और विश्व बैंक औद्योगिक देशों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए बने थे, ये नवस्वाधीन राष्ट्रों की समस्याओं से निपटने में दक्ष नहीं थे।
- विकासशील देशों ने समूह 77 (जी-77) के रूप में संगठित होकर NIEO के लिए आवाज़ उठाई।
- NIEO का आशय: एक ऐसी व्यवस्था से था जिसमें उन्हें अपने संसाधनों पर सही मायनों में नियंत्रण मिल सके, विकास के लिए अधिक सहायता मिले, कच्चे माल के सही दाम मिलें, और विकसित देशों के बाज़ारों में बेहतर पहुँच मिले।
ब्रेटन वुड्स का समापन और ‘वैश्वीकरण’ की शुरुआत
- डॉलर का पतन: 1960 के दशक से विदेशों में अपनी गतिविधियों की भारी लागत के कारण अमेरिकी डॉलर का मूल्य सोने की तुलना में गिरने लगा।
- स्थिर विनिमय दर की समाप्ति: अंततः स्थिर विनिमय दर की व्यवस्था विफल हो गई और प्रवाहमयी या अस्थिर विनिमय दर की व्यवस्था शुरू की गई।
- बहुराष्ट्रीय कंपनियों का रुख: 1970 के दशक के आखिर सालों से बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ (MNCs) एशिया के ऐसे देशों में उत्पादन केंद्रित करने लगीं जहाँ वेतन कम थे (जैसे: चीन)।
- चीन में नई आर्थिक नीतियों और सोवियत खेमे के बिखराव के बाद, चीन जैसे देशों में कम वेतन के कारण MNCs ने जमकर निवेश करना शुरू कर दिया, जिससे विश्व व्यापार और पूँजी प्रवाहों पर असर पड़ा।
- निष्कर्ष: उद्योगों को कम वेतन वाले देशों में ले जाने से वैश्विक व्यापार और पूँजी प्रवाहों पर भी असर पड़ा, जिससे दुनिया का आर्थिक भूगोल पूरी तरह बदल चुका है।
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