पाठ – 4
औद्योगीकरण का युग
In this post we have given the detailed notes of class 10 SST (History) Chapter 4 औद्योगीकरण का युग (The Age of Industrialisation) in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 10 exams.
इस पोस्ट में कक्षा 10 के सामाजिक विज्ञान (इतिहास) के पाठ 4 औद्योगीकरण का युग (The Age of Industrialisation) के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 10 में है एवं सामाजिक विज्ञान विषय पढ़ रहे है।
| Board | CBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board |
| Textbook | NCERT |
| Class | Class 10 |
| Subject | SST (History) |
| Chapter no. | Chapter 4 |
| Chapter Name | औद्योगीकरण का युग (The Age of Industrialisation) |
| Category | Class 10 SST (History) Notes in Hindi |
| Medium | Hindi |
औद्योगिक क्रांति से पहले: आदि-औद्योगीकरण (Proto-Industrialisation)
कारखानों की स्थापना से पहले ही, अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार के लिए बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन होने लगा था। इतिहास के इस चरण को आदि-औद्योगीकरण कहा जाता है।
आदि-औद्योगीकरण की व्यवस्था
- शहरों के सौदागरों का गाँवों की ओर रुख: 17वीं और 18वीं शताब्दी में, यूरोपीय शहरों के सौदागर गाँवों की तरफ़ जाने लगे।
- कारण:
- बढ़ती माँग: विश्व व्यापार के विस्तार और उपनिवेशों की स्थापना के कारण चीज़ों की माँग बढ़ रही थी।
- शहरों में नियंत्रण: शहरों में शहरी दस्तकारी और व्यापारिक गिल्ड्स (उत्पादकों के संगठन) बहुत ताक़तवर थे, जो नए व्यापारियों को कारोबार करने से रोकते थे।
- गाँवों में उत्पादन: गाँवों में गरीब काश्तकार और दस्तकार सौदागरों के लिए काम करते थे। यह आय उनके खेती से सिमटते आय में एक बड़ा सहारा देती थी।
- उत्पादन का नेटवर्क: इंग्लैंड के कपड़ा व्यवसायी (सौदागर) स्टेप्लर्स से ऊन खरीदते थे, उसे सूत कातने वालों के पास पहुँचाते थे। धागे को बुनकरों, फुलर्ज़ और रंगसाजों के पास ले जाया जाता था। लंदन कपड़ों का फिनिशिंग सेंटर बन गया था।
- विशेषता: उत्पादन कारखानों की बजाय घरों में होता था और इस पर सौदागरों का नियंत्रण होता था।
कारखानों का उदय
प्रारंभिक कारखाने और तकनीकी बदलाव
- शुरुआत: इंग्लैंड में सबसे पहले कारखाने 1730 के दशक में खुले, लेकिन उनकी संख्या में तेज़ी से इज़ाफ़ा 18वीं सदी के आख़िर में ही हुआ।
- नए युग का प्रतीक: कपास (कॉटन) नए युग का पहला प्रतीक थी। 1760 से 1787 के बीच कपास के आयात में भारी वृद्धि हुई।
- महत्वपूर्ण आविष्कार: 18वीं सदी में कताई, ऐंठने और लपेटने की प्रक्रिया में कुशलता बढ़ाने वाले कई आविष्कार हुए।
- सूती कपड़ा मिल की रूपरेखा: रिचर्ड आर्कराइट ने सूती कपड़ा मिल की रूपरेखा सामने रखी।
- कारखानों का लाभ: कारखाने में सारी प्रक्रियाएँ एक छत के नीचे, एक मालिक के हाथों में आ गईं। इससे उत्पादन प्रक्रिया पर निगरानी, गुणवत्ता का ध्यान रखना और मज़दूरों पर नज़र रखना संभव हो गया।
औद्योगिक परिवर्तन की रफ़्तार
औद्योगीकरण की प्रक्रिया धीमी थी और यह केवल फैक्ट्री उद्योगों तक ही सीमित नहीं थी।
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बिंदु |
विवरण |
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प्रमुख उद्योग |
पहला चरण (1840 तक): सूती उद्योग। दूसरा चरण (1840 के बाद): लोहा और स्टील उद्योग (रेलवे के विस्तार के कारण)। |
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परंपरागत उद्योगों का योगदान |
19वीं सदी के आख़िर में भी, तकनीकी रूप से विकसित क्षेत्रों में काम करने वाले मज़दूरों की संख्या कुल मज़दूरों का 20 प्रतिशत से ज़्यादा नहीं थी। बाकी उत्पादन छोटे और घरेलू इकाइयों में होता था। |
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प्रौद्योगिकीय बदलावों की धीमी गति |
नई तकनीकें महंगी थीं, अक्सर खराब हो जाती थीं और उनकी मरम्मत पर ख़र्चा आता था। जेम्स वॉट ने भाप इंजन में सुधार किया (1871 में पेटेंट), लेकिन उद्योगपति उन्हें अपनाने में हिचकिचा रहे थे। |
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औसत मज़दूर |
19वीं सदी के मध्य का औसत मज़दूर मशीनों पर काम करने वाला नहीं, बल्कि परंपरागत कारीगर और मज़दूर ही होता था। |
हाथ का श्रम और वाष्प शक्ति
विक्टोरिया कालीन ब्रिटेन में मानव श्रम की बहुतायत थी, इसलिए उद्योगपति मशीनों के बजाय मज़दूरों को काम पर रखना ज़्यादा पसंद करते थे।
- श्रम की बहुतायत: ब्रिटेन में गरीब किसानों और बेकार लोगों की संख्या अधिक थी। जब श्रमिकों की बहुतायत होती है तो वेतन गिर जाते हैं, इसलिए मशीनों में निवेश करना लाभप्रद नहीं था।
- मौसमी श्रम की माँग: बहुत सारे उद्योगों में श्रमिकों की माँग मौसमी आधार पर घटती-बढ़ती रहती थी (जैसे गैसघर, शराबखाने, बंदरगाह)। ऐसे में उद्योगपति मशीनों की बजाय मज़दूरों को काम पर रखना पसंद करते थे।
- उत्पादों की विविधता: बाज़ार में बारीक डिज़ाइन और ख़ास आकारों वाली चीज़ों की माँग रहती थी (जैसे: 500 तरह के हथौड़े)। ये उत्पाद मशीनों से नहीं, बल्कि हाथों की निपुणता से ही तैयार किए जा सकते थे।
- उच्च वर्ग की पसंद: विक्टोरिया कालीन ब्रिटेन में उच्च वर्ग के लोग हाथों से बनी चीज़ों को तरजीह देते थे, जिन्हें परिष्कार और सुरुचि का प्रतीक माना जाता था। मशीनों से बनने वाले उत्पादों को उपनिवेशों में निर्यात कर दिया जाता था।
मज़दूरों की जिंदगी
- नौकरी पाना: नौकरी मिलने की संभावना यारी-दोस्ती और जान-पहचान पर निर्भर करती थी।
- जीवन की कठिनाइयाँ: रोज़गार चाहने वाले लोगों को हफ्तों इंतज़ार करना पड़ता था और वे पुलों के नीचे या रैन बसेरों में रातें काटते थे। मौसमी काम की वजह से उन्हें बीच-बीच में बहुत समय तक खाली बैठना पड़ता था।
- आय की अस्थिरता: नेपोलियनी युद्ध के दौरान कीमतें तेज़ी से बढ़ीं, जिससे मज़दूरों की वास्तविक आय के मूल्य में भारी कमी आ गई। आय रोज़गार की अवधि पर भी निर्भर करती थी।
- प्रौद्योगिकी का विरोध: बेरोज़गारी की आशंका के कारण मज़दूर नई प्रौद्योगिकी से चिढ़ते थे। ऊन उद्योग में स्पिनिंग जेनी मशीन के इस्तेमाल के विरोध में हाथ से ऊन कातने वाली औरतों ने इन मशीनों पर हमला किया। * शहरों में नए रोज़गार (1840 के बाद): शहरों में निर्माण गतिविधियों में तेज़ी आई (रेलवे स्टेशन, लाइनें, सुरंगें), जिससे परिवहन उद्योग और निर्माण में नए रोज़गार पैदा हुए।
उपनिवेशों में औद्योगीकरण: भारतीय कपड़ा उद्योग
भारतीय कपड़े का युग (औपनिवेशिक युग से पहले)
- बाज़ार में दबदबा: मशीन उद्योगों के युग से पहले अंतर्राष्ट्रीय कपड़ा बाज़ार में भारत के रेशमी और महीन सूती उत्पादों का ही दबदबा था।
- व्यापार नेटवर्क:
- सड़क मार्ग: आर्मीनियन और फ़ारसी सौदागर पंजाब से अफ़ग़ानिस्तान, पूर्वी फ़ारस और मध्य एशिया के रास्ते यहाँ की चीजें ले जाते थे।
- समुद्री मार्ग: गुजरात के तट पर स्थित सूरत बंदरगाह खाड़ी और लाल सागर के बंदरगाहों से जुड़ा था। कोरोमंडल तट पर मछलीपटनम और बंगाल में हुगली से भी व्यापार चलता था।
- व्यवस्था का टूटना: 1750 के दशक तक यूरोपीय कंपनियों की ताक़त बढ़ने और उन्होंने व्यापार पर इज़ारेदारी अधिकार प्राप्त करने से सूरत व हुगली जैसे पुराने बंदरगाह कमज़ोर पड़ गए। इनका स्थान बंबई और कलकत्ता जैसे नए बंदरगाहों ने ले लिया, जो यूरोपीय कंपनियों के नियंत्रण में थे।
बुनकरों का क्या हुआ?
ईस्ट इंडिया कंपनी की राजनीतिक सत्ता स्थापित होने के बाद कंपनी ने प्रतिस्पर्धा ख़त्म करने और नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए नई व्यवस्था लागू की:
- गुमाश्तों की नियुक्ति: कंपनी ने कपड़ा व्यापार में सक्रिय व्यापारियों और दलालों को ख़त्म करके, बुनकरों पर सीधी निगरानी रखने, माल इकट्ठा करने और गुणवत्ता जाँचने के लिए वेतनभोगी कर्मचारी (गुमाश्ता) तैनात कर दिए।
- पेशगी/क़र्ज़: बुनकरों को अन्य खरीदारों के साथ कारोबार करने पर पाबंदी लगा दी गई। उन्हें पेशगी रकम दी जाती थी। जो क़र्ज़ लेते थे, उन्हें अपना माल गुमाश्ता को ही देना पड़ता था।
- टकराव: नए गुमाश्ता बाहर के लोग थे, उनका गाँवों से पुराना सामाजिक संबंध नहीं था। वे दंभपूर्ण व्यवहार करते थे और माल समय पर तैयार न होने पर बुनकरों को सज़ा देते थे।
- बुनकरों की प्रतिक्रिया: बुनकर दाम पर मोलभाव नहीं कर सकते थे और क़र्ज़ की वजह से कंपनी से बँधे हुए थे। बहुत सारे बुनकर गाँव छोड़कर चले गए, या कर्जा लौटाने से इनकार कर दिया और खेतों में मज़दूरी करने लगे।
भारत में मैनचेस्टर का आना
19वीं सदी की शुरुआत में भारत के कपड़ा निर्यात में गिरावट आने लगी और यह लंबे समय तक जारी रही।
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कारण |
विवरण |
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ब्रिटेन में आयात शुल्क |
इंग्लैंड के उद्योगपतियों ने सरकार पर दबाव डालकर आयातित कपड़े पर आयात शुल्क वसूल करवाया, जिससे मैनचेस्टर में बने कपड़े बाहरी प्रतिस्पर्धा के बिना बिक सकें। |
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भारतीय बाज़ार में ब्रिटिश माल |
ईस्ट इंडिया कंपनी पर ब्रिटिश कपड़ों को भारतीय बाज़ारों में बेचने का दबाव पड़ा। 1850 तक सूती कपड़े का आयात भारतीय आयात में 31 प्रतिशत हो गया, और 1870 तक 50 प्रतिशत से ऊपर चला गया। |
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बुनकरों की दोहरी समस्या |
उनका निर्यात बाज़ार ढह रहा था, और स्थानीय बाज़ार सिकुड़ने लगा था। कम लागत पर मशीनों से बनने वाले आयातित उत्पाद इतने सस्ते थे कि बुनकर मुक़ाबला नहीं कर सकते थे। |
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कच्ची कपास की कमी |
अमेरिकी गृहयुद्ध (1860 के दशक) के दौरान अमेरिका से कपास की आमद बंद होने पर ब्रिटेन भारत से कच्चा माल मँगाने लगा, जिससे कच्चे कपास की कीमतें आसमान छूने लगीं। भारतीय बुनकरों को कच्चा माल मनमानी कीमत पर खरीदना पड़ा। |
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भारतीय कारखानों का उत्पादन |
19वीं सदी के आख़िर में भारतीय कारखानों में उत्पादन शुरू होने से बाज़ार मशीनों की बनी चीज़ों से पट गया। |
फैक्ट्रियों का आना (भारतीय उद्यमी)
प्रारंभिक उद्यमी
- पहली मिलें: बंबई में पहली कपड़ा मिल 1854 में लगी। बंगाल में जूट मिलें (1855, 1862) खुलीं। कानपुर में एल्गिन मिल (1860 के दशक) और अहमदाबाद की पहली कपड़ा मिल (1861) चालू हुई।
- पूँजी का स्रोत:
- चीन व्यापार: बहुत सारे व्यावसायिक समूहों ने चीन के साथ अफ़ीम (भारत से चीन) और चाय (चीन से इंग्लैंड) के व्यापार में पैसा कमाया।
- प्रमुख उद्यमी:
- द्वारकानाथ टैगोर (बंगाल): चीन व्यापार में पैसा कमाकर 1830-40 के दशकों में 6 संयुक्त उद्यम कंपनियाँ लगाईं।
- डिनशॉ पेटिट और जमशेदजी नुसरवानजी टाटा (बंबई/पारसी): चीन को निर्यात और इंग्लैंड को कच्ची कपास निर्यात करके पैसा कमाया।
- सेठ हुकुमचंद (मारवाड़ी/कलकत्ता): 1917 में देश की पहली जूट मिल लगाई।
- यूरोपीय प्रबंधकीय एजेंसियाँ: पहले विश्व युद्ध तक बर्ड हीगलर्स, एंड्रयू यूल जैसी यूरोपीय एजेंसियाँ भारतीय उद्योगों का नियंत्रण करती थीं। भारतीय वित्तपोषक केवल पूँजी उपलब्ध कराते थे, जबकि फ़ैसले यूरोपीय एजेंसियाँ लेती थीं।
मज़दूर कहाँ से आए?
- स्रोत: ज़्यादातर औद्योगिक इलाकों में मज़दूर आसपास के जिलों से आते थे (जैसे: बंबई की मिलों में रत्नागिरी से)। कानपुर की मिलों में कानपुर के गाँव से।
- जॉबर की व्यवस्था: नौकरी पाने की संभावना कम थी। उद्योगपति नए मज़दूरों की भर्ती के लिए जॉबर (सरदार/मिस्त्री) रखते थे।
- भूमिका: जॉबर अपने गाँव से लोगों को लाता था, काम का भरोसा देता था और शहर में जमने के लिए मदद करता था।
- शक्ति: बाद में जॉबर मदद के बदले पैसे व तोहफ़ों की माँग करने लगे और मज़दूरों की जिंदगी को नियंत्रित करने लगे।
औद्योगिक विकास का अनूठापन
- यूरोपीय एजेंसियाँ: केवल उन उत्पादों (चाय, कॉफ़ी, खनन, नील, जूट) में दिलचस्पी रखती थीं जिनकी ज़रूरत मुख्य रूप से निर्यात के लिए थी, न कि भारत में बिक्री के लिए।
- भारतीय उद्यमियों का लक्ष्य: शुरुआती भारतीय सूती मिलों में मोटे सूती धागे बनाए जाते थे, जिनका इस्तेमाल भारत के हथकरघा बुनकर करते थे या उन्हें चीन को निर्यात कर दिया जाता था। उन्होंने सीधे मैनचेस्टर की बनी चीज़ों से प्रतिस्पर्धा नहीं की।
- स्वदेशी आंदोलन का प्रभाव (1906 के बाद): राष्ट्रवादियों ने विदेशी कपड़े के बहिष्कार के लिए प्रेरित किया। भारतीय उद्योगपति धागे की बजाय कपड़ा बनाने लगे (1900-1912 के बीच सूती कपड़े का उत्पादन दोगुना हो गया)।
- प्रथम विश्व युद्ध का प्रभाव (1914):
- ब्रिटिश कारखाने सेना की ज़रूरतों के कारण युद्ध संबंधी उत्पादन में व्यस्त थे, इसलिए मैनचेस्टर के माल का आयात कम हो गया।
- भारतीय बाज़ारों को रातोंरात एक विशाल देशी बाज़ार मिल गया।
- भारतीय कारखानों में फ़ौज के लिए जूट की बोरियाँ, वर्दी, जूते आदि सामान बनने लगे, जिससे औद्योगिक उत्पादन तेज़ी से बढ़ा।
- युद्ध के बाद: मैनचेस्टर को भारतीय बाज़ार में पहले वाली हैसियत कभी हासिल नहीं हो पायी। स्थानीय उद्योगपतियों ने घरेलू बाज़ारों पर कब्ज़ा कर लिया।
लघु उद्योगों की बहुतायत
- वर्चस्व: युद्ध के बाद भी अर्थव्यवस्था में विशाल उद्योगों का हिस्सा बहुत छोटा था। बंगाल और बंबई में ही ज़्यादातर मिलें स्थित थीं।
- हथकरघा क्षेत्र: छोटे स्तर के उत्पादन का ही दबदबा रहा। 1900 से 1940 के बीच हथकरघों पर बने कपड़े के उत्पादन में लगातार सुधार हुआ और यह तीन गुना हो चुका था।
- तकनीकी बदलाव: बीसवीं सदी के दूसरे दशक तक बुनकर फ्लाई शटल वाले करघों का इस्तेमाल करने लगे थे, जिससे उत्पादन क्षमता बढ़ी और उत्पादन तेज़ हुआ।
- बुनकरों का अस्तित्व: कुछ बुनकर मोटा कपड़ा बनाते थे (माँग में उतार-चढ़ाव अधिक) जबकि कुछ महीन किस्म का कपड़ा बुनते थे (माँग में उतार-चढ़ाव कम)। मिलें बुने हुए बॉर्डर वाली साड़ियों या लुंगियों की नक़ल नहीं कर सकती थीं।
वस्तुओं के लिए बाज़ार (विज्ञापन)
नये उपभोक्ता पैदा करने का एक तरीका विज्ञापनों का है। औद्योगीकरण की शुरुआत से ही विज्ञापनों ने उत्पादों के बाज़ार को फैलाने में और एक नयी उपभोक्ता संस्कृति रचने में अपनी भूमिका निभाई।
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विज्ञापन की तकनीक |
विवरण |
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लेबल (Labels) |
मैनचेस्टर के कपड़े के बंडलों पर ‘मेड इन मैनचेस्टर’ के लेबल लगते थे, जो गुणवत्ता का प्रतीक थे। इन पर भारतीय देवी-देवताओं (जैसे कृष्ण, सरस्वती) की तसवीरें भी होती थीं ताकि विदेश में बनी चीज़ भी भारतीयों को जानी-पहचानी लगे। |
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कैलेंडर |
कैलेंडर छपवाए जाते थे, जो अनपढ़ लोगों को भी समझ में आ जाते थे। इनमें देवताओं, सम्राटों व नवाबों की तस्वीरें इस्तेमाल होती थीं। (उदा: ग्राइपवॉटर के कैलेंडर पर बाल कृष्ण)। |
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राष्ट्रवादी संदेश |
भारतीय निर्माताओं ने अपने विज्ञापनों में राष्ट्रवादी संदेश दिया। “अगर आप राष्ट्र की परवाह करते हैं तो उन चीज़ों को खरीदिए जिन्हें भारतीयों ने बनाया है।” ये विज्ञापन स्वदेशी के राष्ट्रवादी संदेश के वाहक बन गए। |
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