पाठ – 1
दो ध्रुवीयता का अंत
In this post we have given the detailed notes of Class 12 Political Science Chapter 1 दो ध्रुवीयता का अंत (The End of Bipolarity) in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 12 exams.
इस पोस्ट में कक्षा 12 राजनीति विज्ञान के पाठ 1 दो ध्रुवीयता का अंत (The End of Bipolarity) के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 12 में है एवं सामाजिक विज्ञान विषय पढ़ रहे है।
| Board | CBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board |
| Textbook | NCERT |
| Class | Class 12 |
| Subject | Political Science |
| Chapter no. | Chapter 1 |
| Chapter Name | दो ध्रुवीयता का अंत (The End of Bipolarity) |
| Category | Class 12 Political Science Notes in Hindi |
| Medium | Hindi |
दो ध्रुवीयता का अंत (The End of Bipolarity)
यह अध्याय शीतयुद्ध के सबसे बड़े प्रतीक सोवियत संघ (USSR) के पतन, उसके कारणों, परिणामों और साम्यवादी देशों के लिए पूँजीवाद की ओर संक्रमण के मॉडल ‘शॉक थेरेपी’ पर केंद्रित है।
परिचय और दो ध्रुवीयता का अंत
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तिथि/वर्ष |
घटना |
महत्व |
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1917 |
रूसी क्रांति |
सोवियत समाजवादी गणराज्य संघ (USSR) की नींव। |
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1961 |
बर्लिन की दीवार का निर्माण |
पूँजीवादी दुनिया (पश्चिम) और साम्यवादी दुनिया (पूर्व) के बीच विभाजन का प्रतीक। |
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1989 |
बर्लिन की दीवार का गिरना (9 नवंबर) |
शीतयुद्ध की समाप्ति और जर्मनी के एकीकरण की शुरुआत का प्रतीक। |
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1991 |
सोवियत संघ का विघटन |
रूस, यूक्रेन और बेलारूस द्वारा विघटन की घोषणा। 15 नए स्वतंत्र देशों का उदय। |
सोवियत प्रणाली की मुख्य विशेषताएँ
सोवियत संघ 1917 की बोल्शेविक क्रांति के बाद अस्तित्व में आया, जिसका उद्देश्य पूँजीवाद का विरोध करना और समतामूलक समाज की स्थापना करना था। इसे ‘दूसरी दुनिया’ कहा जाता था।
सकारात्मक विशेषताएँ (शीतयुद्ध के समय):
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विकसित संचार प्रणाली: सोवियत संघ में एक विशाल और विकसित संचार प्रणाली मौजूद थी।
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ऊर्जा और संसाधन: तेल, लौह, गैस और खनिज जैसे ऊर्जा संसाधनों का विशाल भंडार था।
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न्यूनतम जीवन स्तर: राज्य ने अपने नागरिकों के लिए न्यूनतम जीवन स्तर (रोटी, कपड़ा, मकान) सुनिश्चित किया हुआ था।
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बेरोज़गारी का अभाव: देश में बेरोज़गारी लगभग समाप्त थी।
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आवागमन प्रणाली: आवागमन की एक सुव्यवस्थित और विशाल प्रणाली मौजूद थी।
नकारात्मक/प्रमुख कमज़ोरियाँ:
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कम्युनिस्ट पार्टी का निरंकुश शासन: पूरी प्रणाली पर कम्युनिस्ट पार्टी का कड़ा नियंत्रण था, जो जनता के प्रति जवाबदेह नहीं थी।
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लोकतंत्र और अभिव्यक्ति का अभाव: नागरिकों को अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं थी।
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गतिरोध वाली अर्थव्यवस्था: 1970 के दशक के बाद अर्थव्यवस्था गतिहीन हो गई।
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पश्चिमी देशों से पिछड़ापन: यह टेक्नोलॉजी, बुनियादी ढाँचे और उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन में पश्चिमी देशों से पीछे रह गया था।
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हथियारों की होड़: सोवियत संघ ने अपने संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा हथियारों की होड़ में लगाया, जिससे अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव पड़ा।
सोवियत संघ के विघटन के कारण
सोवियत संघ का अचानक विघटन (1991) मुख्यतः निम्नलिखित कारणों से हुआ:
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गोरबाचेव के सुधार: 1985 में मिखाइल गोरबाचेव ने अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए पेरेस्त्रोइका (पुनर्रचना) और ग्लास्नोस्त (खुलापन) की नीति शुरू की।
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इन सुधारों से नागरिकों को अपनी समस्याओं को जानने का मौका मिला, लेकिन पार्टी के नेताओं ने सुधारों का विरोध किया।
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इन सुधारों की धीमी गति से जनता असंतुष्ट थी।
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आर्थिक गतिरोध और महँगी हथियार होड़: सोवियत अर्थव्यवस्था कई वर्षों से गतिरोध में थी। हथियार होड़ में अमेरिका से बराबरी करने की भारी लागत ने इस आर्थिक कमज़ोरी को और बढ़ा दिया।
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राजनीतिक गतिरोध और प्रशासनिक भ्रष्टाचार: कम्युनिस्ट पार्टी का दशकों पुराना निरंकुश शासन और भ्रष्टाचार आम लोगों के प्रति जवाबदेह नहीं था, जिससे जनता में अविश्वास बढ़ा।
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राष्ट्रवाद का उदय: रूस के साथ-साथ बाल्टिक गणराज्यों (एस्टोनिया, लातविया, लिथुआनिया), यूक्रेन, जॉर्जिया जैसे गणराज्यों में राष्ट्रवादी भावनाओं और संप्रभुता की इच्छा प्रबल हुई, जिसने विघटन की माँग को तेज़ किया।
विघटन के परिणाम
सोवियत संघ के विघटन ने विश्व राजनीति को पूरी तरह से बदल दिया।
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शीतयुद्ध की समाप्ति: यह वैचारिक टकराव (साम्यवाद बनाम पूँजीवाद) का अंत था।
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एकध्रुवीय विश्व का उदय: दो महाशक्तियों (अमेरिका और सोवियत संघ) के अंत के बाद, संयुक्त राज्य अमेरिका दुनिया की एकमात्र महाशक्ति (Unipolar World) बन गया।
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नए देशों का उदय: सोवियत संघ से 15 नए स्वतंत्र देश अस्तित्व में आए।
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इनमें से अधिकांश ने स्वतंत्र राज्यों के राष्ट्रकुल (CIS) का गठन किया।
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शक्ति संतुलन में बदलाव: अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में शक्ति संतुलन बदला। हथियारों की होड़ खत्म हुई और दुनिया को परमाणु युद्ध के जोखिम से मुक्ति मिली।
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पूँजीवादी व्यवस्था की स्वीकार्यता: अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पूँजीवादी व्यवस्था को सबसे अच्छा आर्थिक मॉडल मान लिया गया।
शॉक थेरेपी (आघात पहुँचाकर उपचार)
साम्यवाद के पतन के बाद, पूर्व सोवियत संघ के देशों और पूर्वी यूरोप के देशों में सत्तावादी साम्यवादी प्रणाली से लोकतांत्रिक पूँजीवादी प्रणाली में संक्रमण का एक दर्दनाक मॉडल अपनाया गया, जिसे शॉक थेरेपी कहा गया।
शॉक थेरेपी की विशेषताएँ (IMF और विश्व बैंक द्वारा निर्देशित):
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राज्य की संपत्ति का निजीकरण: सरकारी स्वामित्व वाली संपत्तियों और उद्योगों को निजी हाथों में बेचना।
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सामूहिक फ़ार्मों की जगह निजी फ़ार्म: खेती की सामूहिक प्रणाली को निजी स्वामित्व वाली खेती से बदलना।
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मुक्त व्यापार: अर्थव्यवस्थाओं को विदेशी निवेश और मुक्त व्यापार के लिए खोलना।
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पूँजीवादी देशों से सीधा संबंध: पुराने ‘वारसॉ पैक्ट’ के संबंधों को तोड़कर पश्चिमी देशों से जुड़ना।
शॉक थेरेपी के विनाशकारी परिणाम:
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महाविपदा: अर्थव्यवस्था तबाह हो गई। रूस में लगभग 90% उद्योगों को निजी हाथों में औने-पौने दामों में बेचा गया, जिसे ‘इतिहास की सबसे बड़ी गैराज सेल’ कहा जाता है।
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मुद्रास्फीति: रूसी मुद्रा रूबल में भारी गिरावट आई और जमा की गई बचतें लगभग खत्म हो गईं।
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कल्याणकारी ढाँचे का टूटना: सरकार द्वारा प्रदान किया जाने वाला कल्याणकारी ढाँचा लगभग नष्ट हो गया, जिससे लाखों लोग गरीबी में धकेल दिए गए।
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लोकतांत्रिक संस्थाओं का अभाव: इन देशों में नए संविधान जल्दबाजी में बनाए गए, जिससे कार्यपालिका को ज़्यादा शक्तियाँ मिलीं और लोकतंत्र कमज़ोर रहा।
सोवियत संघ के विघटन के बाद, कई क्षेत्रों में संघर्ष और गृहयुद्ध छिड़ गए।
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रूस: चेचन्या और दागिस्तान में हिंसक अलगाववादी आंदोलन हुए।
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चेकोस्लोवाकिया: यह शांतिपूर्ण तरीके से चेक गणराज्य और स्लोवाकिया में विभाजित हो गया।
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बाल्कन क्षेत्र: युगोस्लाविया कई हिस्सों में टूट गया, जिसमें बोस्निया और हर्ज़ेगोविना तथा कोसोवो जैसे स्थानों पर भयानक जातीय संघर्ष हुए।
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मध्य एशियाई गणराज्य: इन गणराज्यों (जैसे कज़ाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान) में हाइड्रोकार्बन (तेल) के विशाल भंडार हैं। इस कारण ये क्षेत्र बाहरी शक्तियों (अमेरिका, चीन, रूस) के बीच प्रभाव का क्षेत्र बन गए।
भारत और पूर्व-साम्यवादी देश
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भारत-सोवियत संबंध: शीतयुद्ध के दौरान, दोनों देशों के बीच बहुआयामी और घनिष्ठ संबंध थे (राजनीतिक, आर्थिक, सैन्य और तकनीकी)।
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भारत-रूस संबंध: सोवियत संघ के उत्तराधिकारी के रूप में रूस के साथ भारत के संबंध महत्वपूर्ण बने रहे।
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रणनीतिक संबंध: दोनों देश एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में विश्वास करते हैं।
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सैन्य सहयोग: भारत को अधिकांश सैन्य साजो-सामान रूस से मिलता है।
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ऊर्जा सहयोग: रूस भारत की ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
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द्विपक्षीय समझौते: भारत और रूस ने रणनीतिक साझेदारी के कई समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं, जिनमें आतंकवाद, सूचना प्रौद्योगिकी और ऊर्जा सहयोग शामिल हैं।
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