सत्ता के समकालीन केंद्र (CH-2) Notes in Hindi || Class 12 Political Science Chapter 2 in Hindi ||

पाठ – 2

सत्ता के समकालीन केंद्र

In this post we have given the detailed notes of Class 12 Political Science Chapter 2 सत्ता के समकालीन केंद्र (Contemporary Centers of Power) in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 12 exams.

इस पोस्ट में कक्षा 12 राजनीति विज्ञान के पाठ 2 सत्ता के समकालीन केंद्र (Contemporary Centers of Power) के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 12 में है एवं सामाजिक विज्ञान विषय पढ़ रहे है।

BoardCBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board
TextbookNCERT
ClassClass 12
SubjectPolitical Science
Chapter no.Chapter 2
Chapter Nameसत्ता के समकालीन केंद्र (Contemporary Centers of Power)
CategoryClass 12 Political Science Notes in Hindi
MediumHindi
Class 12 Political Science Chapter 2 सत्ता के समकालीन केंद्र (Contemporary Centers of Power) in Hindi

सत्ता के समकालीन केंद्र (Contemporary Centers of Power)

दो ध्रुवीयता के अंत (सोवियत संघ के विघटन) के बाद, विश्व राजनीति में अमेरिकी प्रभुत्व (Hegemony) स्थापित हुआ। लेकिन, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई क्षेत्रीय और आर्थिक संगठनों तथा देशों का उदय हुआ, जिन्होंने अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती दी और शक्ति के वैकल्पिक केंद्र (Alternative Centers of Power) के रूप में अपनी पहचान बनाई।

यूरोपीय संघ (The European Union – EU)

यूरोपीय संघ की स्थापना द्वितीय विश्वयुद्ध के विनाशकारी परिणामों के बाद यूरोप की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने, एकजुटता स्थापित करने और सामूहिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से की गई थी।

पृष्ठभूमि और विकास के चरण:

वर्ष/घटना

विवरण

महत्व

1948

मार्शल योजना का प्रभाव

अमेरिका ने यूरोप के आर्थिक पुनर्निर्माण के लिए सहायता दी, जिससे यूरोपीय आर्थिक सहयोग संगठन (OEEC) की स्थापना हुई।

1949

यूरोपीय परिषद् का गठन

राजनीतिक सहयोग की दिशा में पहला कदम।

1957

यूरोपीय आर्थिक समुदाय (EEC)

छह देशों (फ़्रांस, पश्चिमी जर्मनी, इटली, बेल्जियम, नीदरलैंड्स, लक्ज़मबर्ग) ने रोम की संधि द्वारा गठन किया।

1992

मास्ट्रिच संधि

यूरोपीय आर्थिक समुदाय ने यूरोपीय संघ (EU) का रूप लिया। यह आर्थिक से राजनीतिक संगठन बनने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम था।

यूरोपीय संघ की विशेषताएँ (एक महाशक्ति के रूप में):

  1. अर्थव्यवस्था: यूरोपीय संघ की अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है (2016 में $17 ट्रिलियन से अधिक)। यह अमेरिका से तीन गुना बड़ी है।

  2. मुद्रा: यूरो (Euro) अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व के लिए एक गंभीर चुनौती बन सकती है।

  3. अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव: यह विश्व व्यापार संगठन (WTO) जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठनों में एक महत्वपूर्ण समूह के रूप में काम करता है और अंतर्राष्ट्रीय विवादों में कूटनीतिक प्रभाव रखता है।

  4. सैन्य शक्ति: यूरोपीय संघ के पास दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सेना है। इसके सदस्य देश (जैसे फ़्रांस) संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में स्थायी सीट और परमाणु हथियार भी रखते हैं।

  5. सामूहिक सुरक्षा: एक साझा विदेश और सुरक्षा नीति अपनाने की कोशिश।

आसियान (ASEAN)

आसियान (दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्रों का संगठन) की स्थापना इन देशों द्वारा अपने क्षेत्र की आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक प्रगति को तेज़ करने और क्षेत्रीय शांति व स्थिरता को बढ़ावा देने के लिए की गई थी।

गठन और उद्देश्य:

  • गठन: 1967 में पाँच देशों (इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, सिंगापुर, और थाईलैंड) द्वारा बैंकॉक घोषणा (Bangkok Declaration) पर हस्ताक्षर करके आसियान की स्थापना की गई।

  • वर्तमान सदस्य: वर्तमान में इसमें 10 सदस्य देश हैं।

  • प्रमुख उद्देश्य: आर्थिक विकास को तेज़ करना, सामाजिक-सांस्कृतिक विकास करना और क्षेत्रीय शांति व स्थिरता को बनाए रखना।

आसियान शैली (The ASEAN Way):

आसियान ने अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का एक नया तरीका अपनाया, जिसे आसियान शैली कहा जाता है, जो निम्नलिखित पर आधारित है:

  • अनौपचारिकता: सदस्य देशों के बीच अनौपचारिक और गैर-टकरावपूर्ण मेल-मिलाप को प्राथमिकता देना।

  • संप्रभुता का सम्मान: सदस्य देशों की संप्रभुता का पूर्ण सम्मान।

  • सर्वसम्मति से निर्णय: सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाते हैं ताकि सभी सदस्य समान महसूस करें।

आसियान समुदाय के तीन स्तंभ (2003):

आसियान ने 2003 में आसियान समुदाय के निर्माण की घोषणा की, जिसके तीन मुख्य स्तंभ हैं:

स्तंभ

उद्देश्य

आसियान सुरक्षा समुदाय (ASC)

क्षेत्रीय विवादों को शांतिपूर्ण ढंग से निपटाना, सैन्य टकराव से दूर रहना, और सदस्य देशों के बीच सुरक्षा सहयोग को बढ़ावा देना।

आसियान आर्थिक समुदाय (AEC)

सदस्य देशों के लिए एक समान बाज़ार और उत्पादन आधार तैयार करना। सामाजिक और आर्थिक विकास को बढ़ावा देना।

आसियान सामाजिक-सांस्कृतिक समुदाय (ASCC)

सामाजिक विकास, सांस्कृतिक सहयोग और गरीबी कम करना।

आसियान क्षेत्रीय मंच (ARF):

1994 में स्थापित यह संगठन सुरक्षा और विदेश नीति के तालमेल के लिए बनाया गया है।

चीन का उदय (The Rise of China)

चीन की अर्थव्यवस्था 1978 के बाद तेज़ी से विकसित हुई और यह शक्ति के एक प्रमुख केंद्र के रूप में उभरा।

चीन के आर्थिक विकास की समयरेखा (The Journey):

वर्ष/दशक

नीति/घटना

महत्व

1949-1972

सोवियत मॉडल पर आधारित बंद अर्थव्यवस्था

विदेशी व्यापार सीमित था और राज्य ने सभी उद्योगों का नियंत्रण किया।

1972

अमेरिका के साथ संबंध

चीन ने अपना एकांतवास (Isolation) समाप्त किया, जिससे पश्चिमी दुनिया के लिए रास्ते खुले।

1973

चार आधुनिकीकरण

झोउ एनलाई ने कृषि, उद्योग, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, और रक्षा में आधुनिकीकरण का प्रस्ताव रखा।

1978

‘ओपेन डोर’ (मुक्त द्वार) की नीति

देंग श्याओपेंग ने बाहरी दुनिया से निवेश और प्रौद्योगिकी प्राप्त करने के लिए अर्थव्यवस्था को खोल दिया।

1982

कृषि का निजीकरण

उत्पादन बढ़ा और ग्रामीण आय में वृद्धि हुई।

1998

उद्योगों का निजीकरण

उद्योगों को निजी हाथों में सौंपना।

2001

विश्व व्यापार संगठन (WTO) में शामिल होना

एक प्रमुख व्यापारिक शक्ति के रूप में अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में चीन की स्थिति मज़बूत हुई।

चीन के उदय के परिणाम (Impact):

  • तेज़ आर्थिक विकास: चीन दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती आर्थिक शक्ति बन गया। अनुमान है कि 2040 तक चीन दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बन जाएगा।

  • क्षेत्रीय प्रभाव: चीन पूर्व एशिया में आर्थिक विकास का इंजन बन गया है और एशियाई मामलों में उसका प्रभाव अभूतपूर्व रूप से बढ़ा है।

  • विदेशी निवेश: चीन विदेशी निवेश के लिए सबसे आकर्षक केंद्र बन गया है, जिससे उसकी आर्थिक ताकत बढ़ी है।

भारत और चीन के संबंध

दोनों देश एशिया की दो बड़ी आबादी वाले देश हैं।

  • सकारात्मक पहलू: दोनों देशों ने 1988 के बाद से सीमा विवादों को शांत करने, व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए हैं।

  • नकारात्मक पहलू (विवाद):

    • सीमा विवाद: अक्साई चिन (जम्मू-कश्मीर) और अरुणाचल प्रदेश की सीमाओं पर विवाद। 1962 में सीमा को लेकर युद्ध भी हुआ था।

    • तिब्बत: तिब्बत को लेकर चीन की नीति और भारत द्वारा दलाई लामा को शरण देना।

    • पाकिस्तान को सहयोग: चीन का पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम में सहयोग और भारत के परमाणु परीक्षणों का विरोध।

सत्ता के अन्य केंद्र

यूरोपीय संघ, आसियान और चीन के अलावा, कई अन्य देश भी शक्ति के केंद्र के रूप में उभरे हैं:

भारत (India)

  • जनसांख्यिकी लाभांश (Demographic Dividend): भारत की विशाल युवा आबादी और तेज़ गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था इसे एक बड़ी शक्ति बनाती है।

  • लोकतंत्र का मॉडल: एक सफल और स्थिर लोकतंत्र के रूप में भारत का विश्व में सम्मान है।

  • कूटनीतिक भूमिका: भारत गुटनिरपेक्ष आंदोलन, G-20, और संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली आवाज़ है।

जापान (Japan)

  • आर्थिक शक्ति: द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जापान ने अभूतपूर्व आर्थिक चमत्कार किया और यह दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया।

  • तकनीकी शक्ति: यह उन्नत प्रौद्योगिकी, रोबोटिक्स और ऑटोमोबाइल उद्योग के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

  • सैन्य क्षमता: हालाँकि, उसका संविधान शांतिवादी है, लेकिन उसकी सैन्य क्षमता (विशेषकर वायुसेना और नौसेना) तेज़ी से बढ़ रही है।

इज़राइल (Israel)

  • तकनीकी और औद्योगिक शक्ति: कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और सीमित प्राकृतिक संसाधनों के बावजूद, इज़राइल अपनी अर्थव्यवस्था, कृषि और रक्षा प्रौद्योगिकी (विशेषकर मिसाइल रक्षा) के मामले में तेज़ी से विकसित हुआ है।

  • सैन्य शक्ति: इज़राइल की सैन्य और खुफिया क्षमता (मोसाद) दुनिया में सबसे उन्नत मानी जाती है।

  • भौगोलिक महत्व: मध्य-पूर्व के एक अस्थिर क्षेत्र में इसका अस्तित्व और प्रभाव इसे एक महत्वपूर्ण शक्ति केंद्र बनाता है।

ब्रिक्स (BRICS)

यह उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं का एक समूह है, जो भविष्य में अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती देने की क्षमता रखता है।

  • सदस्य: ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका।

  • उद्देश्य: अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों में पश्चिम के प्रभुत्व को चुनौती देना और वैश्विक आर्थिक व राजनीतिक मामलों में विकासशील देशों की आवाज़ को मज़बूत करना।

  • उपलब्धि: ब्रिक्स ने न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) की स्थापना की है, जो अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संरचना में एक वैकल्पिक शक्ति के रूप में काम कर सकता है।

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