नियोजित विकास की राजनीति (CH-3) Notes in Hindi || Class 12 Political Science Book 2 Chapter 3 in Hindi ||

पाठ – 3

नियोजित विकास की राजनीति

In this post we have given the detailed notes of Class 12 Political Science Book 2 Chapter 3 नियोजित विकास की राजनीति (Politics of Planned Development) in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 12 exams.

इस पोस्ट में कक्षा 12 राजनीति विज्ञान पुस्तक 2 के पाठ 3 नियोजित विकास की राजनीति (Politics of Planned Development) के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 12 में है एवं सामाजिक विज्ञान विषय पढ़ रहे है।

BoardCBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board
TextbookNCERT
ClassClass 12
SubjectPolitical Science Book 2
Chapter no.Chapter 3
Chapter Nameनियोजित विकास की राजनीति (Politics of Planned Development)
CategoryClass 12 Political Science Notes in Hindi
MediumHindi
Class 12 Political Science Book 2 Chapter 3 नियोजित विकास की राजनीति (Politics of Planned Development) in Hindi

नियोजित विकास की राजनीति (Politics of Planned Development)

परिचय: विकास का विचार

आज़ादी के बाद, राष्ट्र-निर्माण की चुनौती के साथ ही भारत को आर्थिक विकास की चुनौती का सामना करना पड़ा।

  • विकास का अर्थ: शुरुआती दौर में ‘विकास’ का मतलब ज़्यादातर पश्चिमी देशों (अमेरिका, यूरोप) की तरह आधुनिक बनना माना गया, जिसमें औद्योगीकरण, आधुनिकीकरण और सार्वजनिक कल्याण शामिल था।

  • विकास के मुख्य मुद्दे:

    1. विकास के लिए कौन सा मॉडल अपनाया जाए? (पूंजीवादी या समाजवादी)

    2. विकास में राज्य (सरकार) की क्या भूमिका होगी?

    3. आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए?

विकास के दो मॉडल

स्वतंत्रता के समय भारत के सामने विकास के दो मुख्य मॉडल थे, जिन पर विश्व राजनीति में भी बहस चल रही थी:

मॉडल

विवरण

पूंजीवादी मॉडल (Capitalist Model)

नेतृत्व: अमेरिका और पश्चिमी यूरोपीय देश।

 

मुख्य विशेषता: विकास का काम पूरी तरह से निजी हाथों (बाजार, उद्योगपति) में होता है। सरकार का हस्तक्षेप न्यूनतम होता है। लाभ कमाना मुख्य उद्देश्य होता है।

समाजवादी मॉडल (Socialist Model)

नेतृत्व: सोवियत संघ।

 

मुख्य विशेषता: विकास का काम पूरी तरह से राज्य (सरकार) नियंत्रित करता है। निजी संपत्ति और मुक्त बाज़ार का विरोध। सामाजिक समानता मुख्य उद्देश्य होता है।

  • भारत का रास्ता: भारत ने मिश्रित अर्थव्यवस्था (Mixed Economy) का रास्ता चुना।

    • सार्वजनिक क्षेत्र (Public Sector): कृषि, भारी उद्योग, आधारभूत संरचना (बिजली, रेलवे) में सरकार ने बड़ी भूमिका निभाई।

    • निजी क्षेत्र (Private Sector): बाज़ार, कृषि, और छोटे उद्योग निजी हाथों में भी रहे।

    • कारण: भारतीय नेताओं ने महसूस किया कि गरीबी उन्मूलन और सामाजिक न्याय के लिए राज्य का हस्तक्षेप आवश्यक है, जबकि पूंजीवादी मॉडल के कुछ लाभ (जैसे उत्पादकता वृद्धि) भी महत्वपूर्ण हैं।

नियोजन (Planning)

भारत में विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए नियोजन (Planning) को अपनाया गया।

A. योजना आयोग (Planning Commission)

  • गठन: 1950 में भारत सरकार के एक प्रस्ताव द्वारा योजना आयोग का गठन किया गया।

  • अध्यक्ष: प्रधानमंत्री योजना आयोग का पदेन अध्यक्ष होता था।

  • कार्य: देश के संसाधनों का आकलन करना और पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से विकास के लक्ष्य निर्धारित करना।

  • महत्व: शुरुआती दौर में योजना आयोग केंद्रीय शक्ति का प्रतीक बन गया।

  • वर्तमान स्थिति: 1 जनवरी 2015 को योजना आयोग को भंग करके इसके स्थान पर नीति आयोग (NITI Aayog) का गठन किया गया।

B. बॉम्बे प्लान (Bombay Plan)

  • वर्ष: 1944 (आज़ादी से पहले)।

  • मुख्य बिंदु: भारत के प्रमुख उद्योगपतियों के एक समूह ने एक साझा प्रस्ताव तैयार किया था।

  • विचार: इसका उद्देश्य था कि सरकार को औद्योगिक और आर्थिक निवेश के क्षेत्र में बड़ी पहल करनी चाहिए। इस प्लान ने साबित कर दिया कि उद्योगपति भी चाहते थे कि अर्थव्यवस्था में राज्य एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाए।

पंचवर्षीय योजनाएँ (Five Year Plans)

नियोजन की प्रक्रिया को व्यवस्थित करने के लिए पंचवर्षीय योजनाओं का विचार सोवियत संघ से लिया गया था।

A. पहली पंचवर्षीय योजना (1951-1956)

  • उद्देश्य: धीमी गति से विकास करना, गरीबी के जाल से बाहर निकलना, और अर्थव्यवस्था की आधारशिला रखना।

  • प्राथमिकता: कृषि क्षेत्र पर सबसे ज़्यादा ध्यान दिया गया।

  • मुख्य अर्थशास्त्री: के. एन. राज

  • कार्य: बाँधों और सिंचाई के लिए बड़े निवेश किए गए (जैसे भाखड़ा नांगल बाँध)। भूमि सुधारों को लागू करने पर भी ज़ोर दिया गया।

  • निष्कर्ष: यह योजना सफल रही और देश की राष्ट्रीय आय में 8% की वृद्धि हुई।

B. दूसरी पंचवर्षीय योजना (1956-1961)

  • उद्देश्य: संरचनात्मक परिवर्तन लाना, तेज़ गति से विकास करना।

  • प्राथमिकता: भारी औद्योगीकरण (Heavy Industrialization) पर ज़ोर।

  • मुख्य अर्थशास्त्री: पी. सी. महालनोबिस (जिन्होंने भारतीय सांख्यिकीय संस्थान की स्थापना की)।

  • कार्य: सरकार ने देसी उद्योगों को संरक्षण देने के लिए भारी टैरिफ (आयात शुल्क) लगाए। सार्वजनिक क्षेत्र के लिए लोहा और इस्पात जैसे उद्योगों को विकसित करने पर ध्यान केंद्रित किया गया।

  • निष्कर्ष: इस योजना के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था में ढाँचागत बदलाव आए, लेकिन विदेशी मुद्रा संकट और कुछ क्षेत्रों में असफलता भी देखने को मिली।

प्रमुख विवाद

नियोजित विकास के मॉडल पर देश में दो मुख्य विवाद उत्पन्न हुए:

A. कृषि बनाम उद्योग (Agriculture vs. Industry)

  • विवाद: कुछ आलोचकों का मत था कि दूसरी पंचवर्षीय योजना में उद्योगों पर अत्यधिक ज़ोर दिया गया, जबकि भारत एक कृषि प्रधान देश था।

  • पक्ष में तर्क (उद्योग): महालनोबिस और अन्य अर्थशास्त्रियों ने तर्क दिया कि यदि भारत को आत्मनिर्भर और विकसित बनना है, तो भारी उद्योगों का विकास आवश्यक है। उद्योग ही अर्थव्यवस्था को आधुनिकता की ओर ले जा सकते हैं।

  • पक्ष में तर्क (कृषि): चौधरी चरण सिंह जैसे नेताओं ने तर्क दिया कि नियोजन से शहरी और औद्योगिक वर्ग को लाभ हुआ है, जबकि किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की उपेक्षा की गई है। उनका मानना था कि कृषि के विकास के बिना गरीबी उन्मूलन संभव नहीं है।

B. निजी क्षेत्र बनाम सार्वजनिक क्षेत्र (Private Sector vs. Public Sector)

  • विवाद: योजना में निजी क्षेत्र की भागीदारी की सीमा को लेकर बहस हुई।

  • समाजवादी रुझान: वामपंथी दलों (CPI, सोशलिस्ट) का मानना था कि सरकार ने निजी क्षेत्र को ज़्यादा जगह दी है, जबकि सभी प्रमुख उद्योग और बैंक राष्ट्रीयकृत होने चाहिए।

  • पूंजीवादी रुझान: स्वतंत्र पार्टी और कुछ दक्षिणपंथी दलों का मानना था कि सरकार ने अर्थव्यवस्था पर अनावश्यक नियंत्रण (परमिट-लाइसेंस राज) रखा है, जिससे निजी उद्यमिता का विकास बाधित हुआ है।

विकास के परिणामों का मूल्यांकन

नियोजित विकास के शुरुआती दौर (1950-1960 के दशक) के मिश्रित परिणाम रहे:

A. सकारात्मक परिणाम (उपलब्धियाँ)

  1. आधारभूत संरचना: देश में रेलवे, बिजली, इस्पात, बंदरगाह और दूरसंचार जैसी आधारभूत संरचना का विकास हुआ।

  2. आत्मनिर्भरता: उद्योगों के विकास के कारण भारत आयात पर कम निर्भर रहा।

  3. भूमि सुधार: जमींदारी प्रथा की समाप्ति, हदबंदी (Land Ceiling), और चकबंदी जैसे प्रयास हुए, हालांकि वे पूरी तरह सफल नहीं हो पाए।

  4. हरित क्रांति (Green Revolution):

    • समय: 1960 के दशक के उत्तरार्ध में।

    • उद्देश्य: खाद्य संकट को दूर करने के लिए कृषि उत्पादकता बढ़ाना।

    • कार्य: उच्च उपज वाली किस्म (High Yielding Variety – HYV) के बीज, उर्वरक (Fertilizers), और सिंचाई का प्रयोग किया गया।

    • सफलता: गेहूँ के उत्पादन में भारी वृद्धि हुई, जिससे भारत खाद्य के मामले में आत्मनिर्भर बन गया।

    • परिणाम: हरित क्रांति से केवल धनी किसानों को ज़्यादा लाभ मिला, जिससे क्षेत्रीय और वर्ग असमानता बढ़ी।

B. नकारात्मक परिणाम (सीमाएँ)

  1. असमानता: नियोजित विकास के कारण बड़े उद्योगपतियों और धनी किसानों को लाभ हुआ, जिससे गरीब और अमीर के बीच की खाई और गहरी हो गई।

  2. क्षेत्रीय असंतुलन: कुछ क्षेत्र (जैसे पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश) बहुत विकसित हुए, जबकि अन्य पिछड़े रहे।

  3. कुशल प्रशासन का अभाव: नौकरशाही और राजनीतिक भ्रष्टाचार के कारण कई योजनाएँ कुशलतापूर्वक लागू नहीं हो पाईं।

शुरुआती विकास का अंतिम दौर

1960 का दशक भारत के लिए कई समस्याओं वाला था, जिसे ‘खतरनाक दशक’ कहा जाता है।

  • खाद्य संकट: मानसून की विफलता और युद्धों के कारण गंभीर खाद्य संकट उत्पन्न हुआ। भारत को अमेरिका से अनाज आयात करना पड़ा (विशेष रूप से बिहार में)।

  • आर्थिक दबाव: चीन और पाकिस्तान के साथ युद्धों (1962, 1965) के कारण रक्षा खर्च बढ़ा और विदेशी मुद्रा पर दबाव पड़ा।

  • नेहरू की मृत्यु: 1964 में प्रधानमंत्री नेहरू की मृत्यु से राजनीतिक नेतृत्व की अनिश्चितता पैदा हुई।

इन चुनौतियों ने नियोजित विकास के मॉडल को और अधिक कठोर और केंद्रित बनाने की दिशा में प्रेरित किया।

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