पाठ – 9
संविधान – एक जीवंत दस्तावेज़
In this post we have given the detailed notes of Class 11 Political Science Book 2 Chapter 9 संविधान – एक जीवंत दस्तावेज़ (Constitution – A Living Document) in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 11 exams.
इस पोस्ट में कक्षा 11 राजनीति विज्ञान पुस्तक 2 के पाठ 9 संविधान – एक जीवंत दस्तावेज़ (Constitution – A Living Document) के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 11 में है एवं सामाजिक विज्ञान विषय पढ़ रहे है।
| Board | CBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board |
| Textbook | NCERT |
| Class | Class 11 |
| Subject | Political Science Book 2 |
| Chapter no. | Chapter 9 |
| Chapter Name | संविधान – एक जीवंत दस्तावेज़ (Constitution – A Living Document) |
| Category | Class 11 Political Science Notes in Hindi |
| Medium | Hindi |
संविधान एक ‘जीवंत दस्तावेज़’ क्यों? (Why is the Constitution a ‘Living Document’?)
संविधान एक जीवंत दस्तावेज़ (Living Document) कहलाता है क्योंकि यह समय के साथ बदलती परिस्थितियों, समाज की आवश्यकताओं और लोगों की आकांक्षाओं के अनुरूप विकसित होता रहता है। यह स्थिर न होकर गतिशील है।
संविधान की लचीलापन और कठोरता
भारतीय संविधान लचीलेपन (Flexibility) और कठोरता (Rigidity) का मिश्रण है:
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कठोरता: कुछ प्रावधानों को संशोधित करना मुश्किल है, जिसके लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। यह संविधान के मूल सिद्धांतों की रक्षा करता है।
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लचीलापन: कुछ प्रावधानों को साधारण कानून बनाने की प्रक्रिया द्वारा आसानी से संशोधित किया जा सकता है। यह परिस्थितियों के अनुसार बदलाव की अनुमति देता है।
संविधान में संशोधन (Amendment to the Constitution)
संविधान में संशोधन का प्रावधान अनुच्छेद 368 में दिया गया है। यह संसद को संविधान में बदलाव करने की शक्ति देता है।
संशोधन की आवश्यकता
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बदलती सामाजिक आवश्यकताएँ: समाज में होने वाले परिवर्तनों (जैसे तकनीकी विकास, नई सामाजिक असमानताएँ) को समायोजित करने के लिए।
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राजनीतिक अनुभव: संविधान लागू होने के बाद उत्पन्न होने वाले राजनीतिक संकटों या अनुभवों के आधार पर सुधार करना।
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न्यायिक व्याख्या: न्यायपालिका द्वारा संविधान की व्याख्या में आए बदलावों को कानूनी रूप देने के लिए।
संशोधन की प्रक्रिया (अनुच्छेद 368 के अनुसार)
भारतीय संविधान में संशोधन की प्रक्रिया मुख्य रूप से तीन तरीकों से की जाती है:
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संशोधन का तरीका |
प्रक्रिया का विवरण |
संशोधन में शामिल प्रावधान |
|---|---|---|
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I. साधारण बहुमत |
संसद के प्रत्येक सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का साधारण बहुमत (50% से अधिक)। (अनुच्छेद 368 के बाहर) |
नए राज्यों का निर्माण, राज्यों की सीमाओं और नाम में परिवर्तन, नागरिकता संबंधी कानून, संसद की कार्यवाही के नियम आदि। |
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II. विशेष बहुमत |
संसद के प्रत्येक सदन में: 1. कुल सदस्यों का बहुमत (50% से अधिक), और 2. उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत (2/3)। |
मौलिक अधिकार, राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांत, भाग IX और IX-A (पंचायतें और नगरपालिकाएँ) आदि। |
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III. विशेष बहुमत + आधे राज्यों का अनुसमर्थन |
संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत (उपरोक्त I & II) से पारित होने के बाद, इसे आधे से अधिक राज्य विधानमंडलों द्वारा भी साधारण बहुमत से अनुमोदित (ratify) किया जाना चाहिए। |
राष्ट्रपति का निर्वाचन, केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन, स्वयं अनुच्छेद 368 में संशोधन आदि। |
न्यायिक व्याख्या और ‘बुनियादी ढाँचा का सिद्धांत’ (Judiciary and The Doctrine of Basic Structure)
संशोधन की शक्ति पर सबसे बड़ी बहस 1970 के दशक में उठी, जिसने न्यायपालिका की भूमिका को परिभाषित किया।
न्यायिक समीक्षा (Judicial Review)
न्यायपालिका संविधान की अंतिम व्याख्याकर्ता और संरक्षक है। यदि संसद द्वारा बनाया गया कोई कानून या संशोधन संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन करता है, तो न्यायपालिका उसे असंवैधानिक (unconstitutional) घोषित कर सकती है।
बुनियादी ढाँचा का सिद्धांत (Doctrine of Basic Structure)
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उद्देश्य: इस सिद्धांत का उद्देश्य संविधान के कुछ मूल तत्वों को संसद की संशोधन शक्ति से परे रखना है।
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मुख्य वाद (Key Case): यह सिद्धांत केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) वाद में प्रतिपादित किया गया था।
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वाद (Case Law) |
वर्ष |
मुख्य निष्कर्ष |
|---|---|---|
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शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ |
1951 |
संसद को मौलिक अधिकारों सहित संविधान के किसी भी भाग में संशोधन करने की शक्ति है। |
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गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य |
1967 |
संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती। |
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केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य |
1973 |
संसद संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है, लेकिन वह संविधान के ‘बुनियादी ढाँचे’ (Basic Structure) को बदल या नष्ट नहीं कर सकती। |
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मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ |
1980 |
न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) और मौलिक अधिकार तथा नीति निदेशक तत्वों के बीच संतुलन को ‘बुनियादी ढाँचे’ का हिस्सा घोषित किया गया। |
बुनियादी ढाँचे के कुछ तत्व (न्यायिक व्याख्या के अनुसार)
यद्यपि संविधान में ‘बुनियादी ढाँचा’ परिभाषित नहीं है, न्यायपालिका ने विभिन्न फैसलों में इसे स्पष्ट किया है। इसमें शामिल हैं:
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संविधान की सर्वोच्चता।
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सरकार का गणतांत्रिक और लोकतांत्रिक स्वरूप।
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संविधान का धर्मनिरपेक्ष स्वरूप।
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विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों का पृथक्करण।
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संविधान का संघीय स्वरूप।
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राष्ट्र की एकता और अखंडता।
प्रमुख संवैधानिक संशोधन (Major Constitutional Amendments)
संविधान के लागू होने के बाद से अब तक (लगभग 105 से अधिक) कई संशोधन किए गए हैं, जो इसके जीवंत स्वरूप को दर्शाते हैं।
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प्रथम संशोधन (1951): भूमि सुधारों से संबंधित कानूनों को न्यायिक समीक्षा से बचाने के लिए नौवीं अनुसूची जोड़ी गई।
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42वाँ संशोधन (1976): इसे ‘लघु संविधान’ (Mini Constitution) भी कहा जाता है। इसने प्रस्तावना में ‘समाजवादी’, ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘अखंडता’ शब्द जोड़े। इसने मौलिक कर्तव्यों को जोड़ा और राष्ट्रपति को मंत्रिपरिषद की सलाह मानने के लिए बाध्य किया।
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44वाँ संशोधन (1978): 42वें संशोधन के कई विवादास्पद प्रावधानों को रद्द किया। संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार से हटाकर कानूनी अधिकार बनाया।
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73वाँ और 74वाँ संशोधन (1992): स्थानीय शासन (पंचायतों और नगरपालिकाओं) को संवैधानिक दर्जा दिया।
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91वाँ संशोधन (2003): दलबदलुओं को मंत्री बनने से रोका और मंत्रिपरिषद के आकार को सीमित किया।
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101वाँ संशोधन (2016): वस्तु एवं सेवा कर (GST) लागू किया।
निष्कर्ष: भारतीय संविधान का विकास
संविधान, एक मूल ढाँचा प्रदान करने वाला दस्तावेज़ होने के साथ-साथ, समय के साथ बदलती राजनीतिक परिस्थितियों और सामाजिक आकांक्षाओं को आत्मसात करने की क्षमता रखता है। संशोधन की प्रक्रिया, न्यायिक व्याख्या और राजनीतिक व्यवहार ने इसे एक मजबूत और जीवंत दस्तावेज़ बनाए रखा है, जो भारत के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए प्रासंगिक बना हुआ है।
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