पाठ – 2
भारत में राष्ट्रवाद
In this post we have given the detailed notes of class 10 SST (History) Chapter 2 भारत में राष्ट्रवाद (Nationalism in India) in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 10 exams.
इस पोस्ट में कक्षा 10 के सामाजिक विज्ञान (इतिहास) के पाठ 2 भारत में राष्ट्रवाद (Nationalism in India) के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 10 में है एवं सामाजिक विज्ञान विषय पढ़ रहे है।
| Board | CBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board |
| Textbook | NCERT |
| Class | Class 10 |
| Subject | SST (History) |
| Chapter no. | Chapter 2 |
| Chapter Name | भारत में राष्ट्रवाद (Nationalism in India) |
| Category | Class 10 SST (History) Notes in Hindi |
| Medium | Hindi |
पहला विश्वयुद्ध, ख़िलाफ़त और असहयोग (1919 के बाद)
भारत में आधुनिक राष्ट्रवाद का उदय उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन के साथ गहराई से जुड़ा हुआ था।
पहले विश्वयुद्ध का प्रभाव (1914-1918)
विश्वयुद्ध ने भारत में एक नई आर्थिक और राजनीतिक स्थिति पैदा कर दी:
- आर्थिक प्रभाव: रक्षा व्यय में भारी इज़ाफ़ा हुआ, जिसकी भरपाई के लिए कर्जे लिए गए और करों में वृद्धि की गई (सीमा शुल्क बढ़ाना, आयकर शुरू करना)।
- मूल्यों में वृद्धि: 1913 से 1918 के बीच कीमतें दोगुनी हो गईं, जिससे आम लोगों की मुश्किलें बढ़ गईं।
- जबरन भर्ती: ग्रामीण क्षेत्रों में सिपाहियों को जबरदस्ती सेना में भर्ती किया गया, जिससे व्यापक गुस्सा था।
- फसल खराब और महामारी: 1918-19 और 1920-21 में फसल खराब हुई, जिससे खाद्य पदार्थों का अभाव हुआ। उसी समय फ्लू की महामारी फैली, जिसके कारण 1921 की जनगणना के अनुसार 120-130 लाख लोग मारे गए।
सत्याग्रह का विचार
महात्मा गांधी जनवरी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे। उन्होंने नस्लभेदी सरकार से लड़ने के लिए सत्याग्रह नामक एक नए जनआंदोलन का तरीका पेश किया।
- अर्थ: सत्य की शक्ति पर आग्रह और सत्य की खोज।
- पद्धति: उत्पीड़क से मुकाबला करने के लिए शारीरिक बल या प्रतिशोध की भावना की आवश्यकता नहीं है। सत्याग्रही केवल अहिंसा के सहारे ही सफल हो सकता है।
- भारत में शुरुआती सत्याग्रह आंदोलन:
- चंपारन (बिहार, 1917): दमनकारी बागान व्यवस्था (नील की खेती) के खिलाफ किसानों को प्रेरित किया।
- खेड़ा (गुजरात, 1917): फसल खराब होने के कारण लगान वसूली में ढील देने के लिए किसानों की मदद की।
- अहमदाबाद (गुजरात, 1918): सूती कपड़ा कारखानों के मजदूरों के लिए सत्याग्रह का आयोजन किया।
रॉलट एक्ट (1919)
ब्रिटिश सरकार ने इस कानून को भारतीय सदस्यों के भारी विरोध के बावजूद जल्दबाजी में पारित कर दिया।
- प्रावधान: सरकार को राजनीतिक गतिविधियों को कुचलने और राजनीतिक कैदियों को दो साल तक बिना मुक़दमा चलाए जेल में बंद रखने का अधिकार मिल गया था।
- विरोध: 6 अप्रैल को एक राष्ट्रव्यापी हड़ताल से आंदोलन शुरू हुआ। शहरों में रैलियाँ, जुलूस, रेलवे वर्कशॉप में हड़ताल और दुकानें बंद हुईं।
- दमन: अंग्रेजों ने दमन शुरू किया और मार्शल लॉ लागू करके जनरल डायर को कमान सौंपी।
जलियाँवाला बाग हत्याकांड (13 अप्रैल 1919)
- घटना: अमृतसर में सालाना बैसाखी मेले में हिस्सा लेने और रॉलट एक्ट का विरोध करने के लिए बड़ी संख्या में लोग जलियाँवाला बाग में जमा हुए थे।
- जनरल डायर की कार्रवाई: डायर हथियारबंद सैनिकों के साथ वहाँ पहुँचा, सभी रास्ते बंद कर दिए और भीड़ पर अंधाधुंध गोलियाँ चला दीं, जिसमें सैंकड़ों लोग मारे गए।
- उद्देश्य: सत्याग्रहियों के मन में दहशत और विस्मय का भाव पैदा करके ‘एक नैतिक प्रभाव’ उत्पन्न करना।
- परिणाम: हिंसा फैलने के कारण महात्मा गांधी ने आंदोलन वापस ले लिया।
ख़िलाफ़त और असहयोग आंदोलन
महात्मा गांधी पूरे भारत में और भी ज्यादा जनाधार वाला आंदोलन खड़ा करना चाहते थे, जिसके लिए उन्हें हिंदू-मुस्लिम एकता जरूरी लगी।
- ख़िलाफ़त का मुद्दा: पहले विश्वयुद्ध में ऑटोमन तुर्की की हार हो चुकी थी। खलीफ़ा (इस्लामिक विश्व के आध्यात्मिक नेता) पर सख्त संधि थोपी जाने की अफवाह थी।
- ख़िलाफ़त समिति: खलीफ़ा की शक्तियों की रक्षा के लिए मार्च 1919 में बंबई में ख़िलाफ़त समिति का गठन किया गया। मोहम्मद अली और शौकत अली बंधुओं ने महात्मा गांधी के साथ चर्चा शुरू की।
- असहयोग आंदोलन (Non-Cooperation): गांधीजी की पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ (1909) के अनुसार, भारत में ब्रिटिश शासन भारतीयों के सहयोग से ही स्थापित हुआ था। अगर सहयोग वापस ले लिया जाए, तो स्वराज की स्थापना हो जाएगी।
- स्वीकृति: सितंबर 1920 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में और दिसंबर 1920 में नागपुर अधिवेशन में ख़िलाफ़त आंदोलन के समर्थन और स्वराज के लिए असहयोग आंदोलन शुरू करने पर स्वीकृति मिली।
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चरणबद्ध कार्यक्रम |
विवरण |
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पहला चरण |
सरकार द्वारा दी गई पदवियाँ लौटाना। |
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दूसरा चरण |
सरकारी नौकरियों, सेना, पुलिस, अदालतों, विधायी परिषदों, स्कूलों और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना। |
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तीसरा चरण |
सरकार के दमन पर व्यापक सविनय अवज्ञा अभियान शुरू करना। |
आंदोलन के भीतर अलग-अलग धाराएँ (1921)
असहयोग आंदोलन में विभिन्न सामाजिक समूहों ने हिस्सा लिया, लेकिन हरेक के लिए स्वराज के अर्थ अलग-अलग थे।
शहरों में आंदोलन
- हिस्सेदारी: शहरी मध्यवर्ग की। हजारों विद्यार्थियों ने स्कूल-कॉलेज छोड़े; हेडमास्टरों, शिक्षकों ने इस्तीफे दिए; वकीलों ने मुक़दमे लड़ना बंद कर दिया।
- आर्थिक प्रभाव:
- विदेशी सामानों का बहिष्कार किया गया।
- शराब की दुकानों की पिकेटिंग (प्रदर्शन या विरोध का एक स्वरूप) की गई।
- विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई, जिससे आयात आधा रह गया।
- भारतीय कपड़ा मिलों और हथकरघों का उत्पादन बढ़ा।
- धीमा पड़ना: आंदोलन कई कारणों से धीमा पड़ गया: खादी का कपड़ा महंगा था; ब्रिटिश संस्थानों के बहिष्कार के स्थान पर वैकल्पिक भारतीय संस्थानों की स्थापना की प्रक्रिया बहुत धीमी थी।
ग्रामीण इलाकों में विद्रोह
(I) अवध में किसान आंदोलन
- नेतृत्व: संन्यासी बाबा रामचंद्र (पहले फिजी में गिरमिटिया मजदूर थे)।
- संघर्ष: तालुकदारों और जमींदारों के खिलाफ, जो भारी-भरकम लगान वसूल करते थे और किसानों से बेगार (बिना पारिश्रमिक के काम) करवाते थे।
- मुख्य मांगें: लगान कम करना, बेगार खत्म करना, दमनकारी जमींदारों का सामाजिक बहिष्कार (नाई-धोबी बंद)।
- संगठन: जून 1920 में जवाहरलाल नेहरू ने गाँवों का दौरा किया। अक्टूबर तक अवध किसान सभा का गठन किया गया, जिसकी 300 से अधिक शाखाएँ बनीं।
- गतिविधि (1921): तालुकदारों के मकानों पर हमले, बाजारों में लूटपाट और अनाज के गोदामों पर कब्ज़ा।
(II) आंध्र प्रदेश की गूडेम पहाड़ियाँ (आदिवासी किसान)
- संघर्ष का स्वरूप: उग्र गुरिल्ला आंदोलन (कांग्रेस ने इसे स्वीकार नहीं किया)।
- परेशानी का कारण: अंग्रेजी सरकार ने बड़े-बड़े जंगलों में लोगों के दाखिल होने, मवेशी चराने और फल-लकड़ी बीनने पर पाबंदी लगा दी, जिससे उनके परंपरागत अधिकार छीने गए और बेगार करने पर मजबूर किया गया।
- नेतृत्व: अल्लूरी सीताराम राजू (स्वयं को ईश्वर का अवतार मानते थे)।
- राजू की विचारधारा: महात्मा गांधी की महानता का गुण गाते थे, लेकिन उनका मानना था कि भारत अहिंसा के बल पर नहीं, बल्कि केवल बलप्रयोग के ज़रिए ही आज़ाद हो सकता है।
- परिणाम: विद्रोहियों ने पुलिस थानों पर हमले किए। 1924 में राजू को फाँसी दे दी गई।
बागानों में स्वराज (असम)
- स्वराज का अर्थ: बागानी मजदूरों के लिए आज़ादी का मतलब उन चारदीवारियों से मुक्त होना था जिनमें उन्हें बंद करके रखा गया था (1859 के इनलैंड इमिग्रेशन एक्ट के तहत)।
- परिणाम: हज़ारों मजदूरों ने बागान छोड़ दिए और अपने घर को चल दिए, यह सोचते हुए कि गांधी राज आ रहा है और हरेक को गाँव में जमीन मिलेगी।
- विफलता: रेलवे और स्टीमरों की हड़ताल के कारण वे रास्ते में फँस गए और पुलिस ने उनकी बुरी तरह पिटाई की।
सविनय अवज्ञा की ओर (1922-1934)
असहयोग आंदोलन की वापसी और राजनीतिक घटनाक्रम
- चौरी-चौरा (फरवरी 1922): गोरखपुर के चौरी-चौरा में एक शांतिपूर्ण जुलूस हिंसक टकराव में बदल गया, जिससे दुखी होकर महात्मा गांधी ने आंदोलन वापस ले लिया।
- स्वराज पार्टी: कांग्रेस के कुछ नेताओं (सी.आर. दास, मोतीलाल नेहरू) ने 1919 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट के तहत प्रांतीय परिषदों के चुनाव में हिस्सा लेने के लिए कांग्रेस के भीतर स्वराज पार्टी का गठन किया।
- पूर्ण स्वराज की मांग: जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस जैसे युवा नेताओं ने उग्र जनांदोलन और पूर्ण स्वतंत्रता के लिए दबाव बनाया।
- लाहौर अधिवेशन (दिसंबर 1929): जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस ने ‘पूर्ण स्वराज’ की मांग को औपचारिक रूप से स्वीकार किया। तय किया गया कि 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाएगा।
साइमन कमीशन (1928)
- गठन: ब्रिटेन की नयी टोरी सरकार ने जॉन साइमन के नेतृत्व में भारत में संवैधानिक व्यवस्था की कार्यशैली का अध्ययन करने और सुझाव देने के लिए आयोग का गठन किया।
- समस्या: इस आयोग में एक भी भारतीय सदस्य नहीं था।
- विरोध: 1928 में भारत पहुँचने पर इसका स्वागत ‘साइमन कमीशन वापस जाओ’ के नारों से किया गया।
- वायसराय लॉर्ड इरविन का प्रस्ताव (अक्तूबर 1929): भारत के लिए ‘डोमीनियन स्टेटस’ (गोलमोल ऐलान) और भावी संविधान पर चर्चा के लिए गोलमेज सम्मेलन का आयोजन। कांग्रेस के नेता संतुष्ट नहीं थे।
नमक यात्रा और सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930)
देश को एकजुट करने के लिए महात्मा गांधी को नमक एक शक्तिशाली प्रतीक दिखाई दिया।
- मांग: 31 जनवरी 1930 को गांधीजी ने वायसराय इरविन को 11 मांगें लिखीं, जिनमें सबसे महत्त्वपूर्ण नमक कर को खत्म करने की थी।
- दांडी यात्रा: इरविन के इनकार करने पर, महात्मा गांधी ने अपने 78 विश्वस्त स्वयंसेवकों के साथ साबरमती आश्रम से दांडी तक 240 कि.मी. की यात्रा शुरू की।
- सविनय अवज्ञा का आरंभ (6 अप्रैल 1930): गांधीजी दांडी पहुँचे और समुद्र का पानी उबालकर नमक बनाया, जो कानून का उल्लंघन था।
- असहयोग और सविनय अवज्ञा में अंतर: इस बार लोगों को न केवल अंग्रेजों का सहयोग न करने के लिए, बल्कि औपनिवेशिक कानूनों का उल्लंघन करने के लिए भी आह्वान किया गया।
आंदोलन के दौरान की मुख्य घटनाएँ:
- हजारों लोगों ने नमक कानून तोड़ा और सरकारी नमक कारखानों के सामने प्रदर्शन किए।
- विदेशी कपड़ों का बहिष्कार, शराब की दुकानों की पिकेटिंग।
- किसानों ने लगान और चौकीदारी कर चुकाने से इनकार किया।
- जंगलों में रहने वाले वन कानूनों का उल्लंघन करने लगे।
- गिरफ्तारी: अब्दुल गफ्फार खान (अप्रैल 1930) और महात्मा गांधी (महीने भर बाद) को गिरफ्तार किया गया।
गांधी-इरविन समझौता (5 मार्च 1931):
- शर्तें: गांधीजी ने लंदन में होने वाले दूसरे गोलमेज सम्मेलन में हिस्सा लेने पर सहमति दी। इसके बदले सरकार राजनीतिक कैदियों को रिहा करने पर राजी हो गई।
- विफलता: लंदन की वार्ता बीच में टूट गई। गांधीजी ने 1932 में सविनय अवज्ञा आंदोलन दोबारा शुरू किया, लेकिन 1934 तक इसकी गति मंद पड़ने लगी।
सविनय अवज्ञा की सीमाएँ (विभिन्न सामाजिक समूहों की भागीदारी)
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सामाजिक समूह |
स्वराज का अर्थ / भागीदारी का कारण |
भागीदारी में सीमाएँ |
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संपन्न किसान (पटिदार, जाट) |
उनके लिए स्वराज की लड़ाई भारी लगान के खिलाफ थी। उन्होंने उत्साह से समर्थन किया। |
1931 में लगानों के घटे बिना आंदोलन वापस लेने पर निराश हुए, 1932 में कईयों ने हिस्सा लेने से इनकार कर दिया। |
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गरीब किसान |
जमींदारों को भाड़ा माफ कराना चाहते थे। उन्होंने रेडिकल आंदोलनों में हिस्सा लिया। |
कांग्रेस अमीर किसानों की नाराजगी के भय से ‘भाड़ा विरोधी’ आंदोलनों को समर्थन देने में हिचकिचाती थी, जिससे संबंध अनिश्चित रहे। |
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व्यवसायी वर्ग |
औपनिवेशिक पाबंदियों से मुक्ति चाहते थे ताकि कारोबार निर्बाध रूप से फल-फूल सके। उन्होंने आर्थिक सहायता दी। (संगठन: FICCI-1927) |
गोलमेज सम्मेलन की विफलता और उग्र गतिविधियों के भय से व्यावसायिक संगठनों का उत्साह मंद पड़ गया। |
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औद्योगिक श्रमिक |
गांधीवादी विचारों को कम वेतन और खराब कार्यस्थितियों के खिलाफ अपनी लड़ाई से जोड़ लिया। |
कांग्रेस उद्योगपतियों को दूर होने के भय से मज़दूरों की मांगों को समाहित करने में हिचकिचाती थी, जिससे वे कांग्रेस से छिटकने लगे। |
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महिलाएँ |
गांधीजी के आह्वान पर राष्ट्र की सेवा करना अपना पवित्र दायित्व समझा। जुलूसों में हिस्सा लिया, नमक बनाया। |
सार्वजनिक भूमिका में इज़ाफ़े के बावजूद, गांधीजी के विचार के कारण कांग्रेस ने उन्हें संगठन में किसी महत्त्वपूर्ण पद पर जगह नहीं दी; केवल प्रतीकात्मक उपस्थिति में दिलचस्पी थी। |
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दलित/उत्पीड़ित |
राजनीतिक सशक्तीकरण (आरक्षण, अलग निर्वाचन क्षेत्र) से सामाजिक अपंगता दूर करना चाहते थे। |
डॉ. अंबेडकर के अलग निर्वाचन क्षेत्रों की मांग पर गांधीजी से विवाद हुआ। पूना पैक्ट (सितंबर 1932) के बाद आरक्षित सीटें मिलीं, फिर भी दलित आंदोलन कांग्रेस को शंका की दृष्टि से देखता रहा। |
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मुस्लिम संगठन |
असहयोग-ख़िलाफ़त के बाद कांग्रेस से कटे हुए थे। अल्पसंख्यकों के रूप में अपनी संस्कृति और पहचान खोने को लेकर चिंतित थे। |
मोहम्मद अली जिन्ना ने केंद्रीय सभा में आरक्षित सीटें और मुस्लिम बहुल प्रांतों में आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व की मांग की। हिंदू महासभा के विरोध के कारण एकता स्थापित नहीं हो पाई। |
सामूहिक अपनेपन का भाव
राष्ट्रवाद की भावना तब पनपती है जब लोग ये महसूस करने लगते हैं कि वे एक ही राष्ट्र के अंग हैं और एक-दूसरे को एकता के सूत्र में बाँधने वाली साझा बात ढूँढ़ लेते हैं।
- इतिहास व साहित्य: भारत माता की छवि, लोक कथाएँ व गीत, चित्र व प्रतीक, सभी ने राष्ट्रवाद को साकार करने में योगदान दिया।
- भारत माता की छवि:
- बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय: 1870 के दशक में ‘वन्दे मातरम्’ गीत लिखा, जिसे बाद में अपने उपन्यास ‘आनन्दमठ’ में शामिल किया।
- अबनीन्द्रनाथ टैगोर (1905): भारत माता की विख्यात छवि को चित्रित किया। उन्हें एक संन्यासिनी के रूप में दर्शाया गया, जो शांत, गंभीर और आध्यात्मिक गुणों से युक्त थीं।
- मातृ छवि के प्रति श्रद्धा को राष्ट्रवाद में आस्था का प्रतीक माना जाने लगा।
- लोक कथाओं का पुनरुद्धार: राष्ट्रवादियों ने लोकगीतों व जनश्रुतियों को इकट्ठा किया, क्योंकि ये कहानियाँ पारंपरिक संस्कृति की सही तसवीर पेश करती थीं।
- रबीन्द्रनाथ टैगोर: बंगाल में लोक-गाथा गीत और मिथकों को इकट्ठा किया।
- नटेसा शास्त्री: मद्रास में ‘द फ़ोकलोर्स ऑफ सदर्न इंडिया’ के नाम से तमिल लोक कथाओं का विशाल संकलन प्रकाशित किया।
- चिह्न और प्रतीक (झंडे):
- स्वदेशी आंदोलन (बंगाल): एक तिरंगा झंडा (हरा, पीला, लाल) तैयार किया गया, जिसमें आठ प्रांतों का प्रतिनिधित्व करते कमल के आठ फूल और हिंदू-मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करता एक अर्धचंद्र दर्शाया गया था।
- स्वराज झंडा (1921): गांधीजी द्वारा तैयार किया गया तिरंगा (सफेद, हरा और लाल), जिसके मध्य में चरखे को जगह दी गई थी, जो स्वावलंबन का प्रतीक था।
- इतिहास की पुनर्व्याख्या: भारतीय इतिहास को अलग ढंग से पढ़ाया जाना शुरू हुआ। प्राचीन गौरवमयी युग (कला, विज्ञान, धर्म, संस्कृति) के बारे में लिखा गया, जब भारत फला-फूला था।
- उद्देश्य: पाठकों को अतीत की महानता पर गर्व करने और ब्रिटिश शासन के तहत दुर्दशा से मुक्ति के लिए संघर्ष का मार्ग अपनाने का आह्वान करना।
- समस्याएँ: जिस अतीत का गौरवगान किया जा रहा था, वह अक्सर हिंदुओं का अतीत था, और इस्तेमाल किए गए प्रतीक हिंदू थे। इसलिए अन्य समुदायों के लोग अलग-थलग महसूस करने लगे थे।
निष्कर्ष
महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने लोगों के असंतोष और परेशानियों को स्वतंत्रता के संगठित आंदोलन में समाहित करने का प्रयास किया। जो राष्ट्र उभर रहा था वह औपनिवेशिक शासन से मुक्ति की चाह रखने वाली बहुत सारी आवाज़ों का पुंज था।
- भारत छोड़ो आंदोलन (1942): क्रिप्स मिशन की असफलता के बाद गांधीजी ने अंग्रेजों के पूरी तरह से भारत छोड़ने पर जोर दिया।
- प्रस्ताव: 8 अगस्त 1942 को अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव का समर्थन किया।
- नारा: गांधीजी ने प्रसिद्ध ‘करो या मरो’ भाषण दिया।
- भागीदारी: यह एक जन आंदोलन था, जिसमें छात्र, मजदूर, किसान और जयप्रकाश नारायण, अरुणा आसफ अली जैसी महिलाएँ/नेता शामिल थे।
- परिणाम: अंग्रेजों द्वारा अत्यधिक बल प्रयोग के बावजूद, इसे दबाने में एक वर्ष से अधिक समय लगा।
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