पाठ – 5
कांग्रेस प्रणाली: चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना
In this post we have given the detailed notes of Class 12 Political Science Book 2 Chapter 5 कांग्रेस प्रणाली: चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना (Congress System: Challenges and Restoration) in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 12 exams.
इस पोस्ट में कक्षा 12 राजनीति विज्ञान पुस्तक 2 के पाठ 5 कांग्रेस प्रणाली: चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना (Congress System: Challenges and Restoration) के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 12 में है एवं सामाजिक विज्ञान विषय पढ़ रहे है।
| Board | CBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board |
| Textbook | NCERT |
| Class | Class 12 |
| Subject | Political Science Book 2 |
| Chapter no. | Chapter 5 |
| Chapter Name | कांग्रेस प्रणाली: चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना (Congress System: Challenges and Restoration) |
| Category | Class 12 Political Science Notes in Hindi |
| Medium | Hindi |
कांग्रेस प्रणाली: चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना (Congress System: Challenges and Restoration)
नेहरू के बाद की राजनीति (Politics after Nehru)
जवाहरलाल नेहरू का निधन (मई 1964) भारतीय राजनीति में एक बड़े शून्य को दर्शाता था। यह सवाल उठ खड़ा हुआ था कि अब देश का नेतृत्व कौन करेगा, और क्या भारतीय लोकतंत्र इस चुनौती का सामना कर पाएगा।
a. उत्तराधिकार की चुनौती
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नेहरू के उत्तराधिकारी: नेहरू के निधन के बाद, नेतृत्व का सवाल शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक ढंग से हल किया गया, जो भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता को दर्शाता है।
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प्रथम उत्तराधिकारी: लाल बहादुर शास्त्री (1964-1966)।
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शास्त्री की चुनौतियाँ: शास्त्री के कार्यकाल में दो बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा: 1. 1965 का भारत-पाकिस्तान युद्ध। 2. मानसून की विफलता और खाद्य संकट।
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शास्त्री का नारा: उन्होंने “जय जवान, जय किसान” का प्रसिद्ध नारा दिया।
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ताशकंद समझौता: शास्त्री ने 1966 में ताशकंद (तत्कालीन सोवियत संघ) में पाकिस्तान के साथ शांति समझौता किया और वहीं अचानक उनका निधन हो गया।
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दूसरे उत्तराधिकारी: इंदिरा गांधी (1966 में प्रधानमंत्री बनीं)।
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कांग्रेस में चयन: वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं के समूह, जिसे सिंडिकेट कहा जाता था, ने मोरारजी देसाई पर इंदिरा गांधी को प्राथमिकता दी क्योंकि उन्हें लगा कि इंदिरा गांधी अनुभवहीन हैं और वे उनके मार्गदर्शन पर चलेंगी।
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1967 का आम चुनाव भारतीय राजनीति में एक निर्णायक मोड़ था, जिसे ‘राजनीतिक भूचाल’ (Political Earthquake) भी कहा जाता है।
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आर्थिक संकट: शास्त्री के शासनकाल के दौरान दो युद्धों (1962 चीन, 1965 पाकिस्तान) और लगातार दो सूखा पड़ने से देश में गंभीर आर्थिक संकट था। खाद्य पदार्थों की कमी, बढ़ती कीमतें, और मुद्रा का अवमूल्यन (Devaluation) हुआ।
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जन विरोध: देश के विभिन्न हिस्सों में बंद और हड़तालें हुईं। सरकार की आर्थिक नीतियों और बढ़ती गरीबी के खिलाफ जनता में असंतोष था।
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बढ़ता विपक्ष: गैर-कांग्रेसी दल एकजुट हुए और कांग्रेस के प्रभुत्व को चुनौती देने के लिए एक रणनीति अपनाई।
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पहलू |
कांग्रेस की स्थिति (1967) |
निष्कर्ष |
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लोकसभा सीटें |
सबसे कम (283 सीटें)। पहली बार इतने कम वोट और सीटें मिलीं। |
कांग्रेस ने केंद्र में बहुमत बनाए रखा, लेकिन उसकी जीत का अंतर कम हो गया। |
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राज्य विधानसभाएं |
9 राज्यों में कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला। |
9 राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारों का गठन हुआ। ये राज्य थे: पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, मद्रास (तमिलनाडु), और केरल। |
c. गैर-कांग्रेसवाद (Non-Congressism)
विपक्षी दलों ने महसूस किया कि कांग्रेस का वोट कई हिस्सों में बंटा हुआ है, जबकि वे खुद एकजुट नहीं हो पाए हैं।
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राम मनोहर लोहिया का विचार: समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया ने ‘गैर-कांग्रेसवाद’ का सिद्धांत दिया। उनका तर्क था कि कांग्रेस का शासन अलोकतांत्रिक और गरीब-विरोधी है। इसलिए, सभी विपक्षी दलों को एक साथ आना चाहिए ताकि कांग्रेस को सत्ता से बाहर किया जा सके।
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गठबंधन की राजनीति: विभिन्न विचारधाराओं वाले गैर-कांग्रेसी दल एकजुट हुए और कई राज्यों में संयुक्त विधायक दल (Samyukta Vidhayak Dal – SVD) की सरकारें बनीं।
d. दल-बदल (Defection)
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परिभाषा: जब कोई निर्वाचित प्रतिनिधि अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़कर किसी अन्य पार्टी में शामिल हो जाता है, तो इसे दल-बदल कहा जाता है।
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‘आया राम गया राम’ मुहावरा: यह मुहावरा हरियाणा के विधायक गया लाल से जुड़ा है, जिन्होंने 15 दिनों के भीतर तीन बार दल-बदल किया। 1967 के बाद दल-बदल की प्रवृत्ति बहुत तेज़ हो गई।
कांग्रेस का विभाजन (Split in Congress)
1969 में कांग्रेस पार्टी दो फाड़ हो गई, जिसका मुख्य कारण इंदिरा गांधी और सिंडिकेट के बीच सत्ता संघर्ष था।
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कांग्रेस का विभाजन: इंदिरा बनाम सिंडिकेट |
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सिंडिकेट: यह कांग्रेस के वरिष्ठ और प्रभावशाली नेताओं का एक समूह था, जैसे कि के. कामराज, एस. निजलिंगप्पा, एस.के. पाटिल, और एन. संजीव रेड्डी। सिंडिकेट ने इंदिरा को प्रधानमंत्री तो बनाया, लेकिन उन्हें नियंत्रित करना चाहा। |
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इंदिरा गांधी: वह अपनी सरकार और पार्टी में स्वतंत्रतापूर्वक काम करना चाहती थीं और सिंडिकेट के प्रभुत्व को खत्म करना चाहती थीं। उन्होंने अपनी लोकप्रियता सिद्ध करने के लिए एक प्रगतिशील कार्यक्रम अपनाया। |
A. टकराव के मुख्य मुद्दे
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समाजवादी नीतियां (The 10 Point Programme): इंदिरा गांधी ने 1967 में ’10 सूत्री कार्यक्रम’ पेश किया, जिसमें बैंकों का राष्ट्रीयकरण, राजाओं के प्रिवी पर्स (विशेष भत्ते) की समाप्ति जैसे प्रगतिशील कदम शामिल थे।
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राष्ट्रपति चुनाव (1969): यह विभाजन का मुख्य कारण बना।
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सिंडिकेट का उम्मीदवार: एन. संजीव रेड्डी।
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इंदिरा का उम्मीदवार: उन्होंने आधिकारिक उम्मीदवार के विरुद्ध वी.वी. गिरि (एक निर्दलीय उम्मीदवार) का समर्थन किया और उन्हें जीतने में मदद की।
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विभाजन: कांग्रेस अध्यक्ष एस. निजलिंगप्पा ने पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण इंदिरा गांधी को पार्टी से निष्कासित कर दिया।
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कांग्रेस (O) – संगठनात्मक/पुरानी: सिंडिकेट के नेतृत्व वाली पार्टी।
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कांग्रेस (R) – रिक्विजिशनिस्ट/नयी: इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली पार्टी।
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इंदिरा गांधी ने पार्टी के विभाजन को जनता के बीच एक ‘विचारधारा की लड़ाई’ के रूप में पेश किया। उन्होंने स्वयं को गरीब और वंचितों के हितों की रक्षक के रूप में प्रस्तुत किया।
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प्रगतिशील कार्यक्रम:
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1969 में 14 प्रमुख निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण।
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राजाओं के प्रिवी पर्स (Prevy Purse) की समाप्ति। (सर्वोच्च न्यायालय से विवाद के बाद 1971 में संवैधानिक संशोधन द्वारा समाप्त)
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गरीबी हटाओ: 1971 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने ‘गरीबी हटाओ’ का प्रसिद्ध नारा दिया।
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ग्रैंड अलायंस: विपक्षी दलों (कांग्रेस-ओ, स्वतंत्र पार्टी, जनसंघ और सोशलिस्ट पार्टी) ने मिलकर ‘ग्रैंड अलायंस’ (महागठबंधन) बनाया और नारा दिया: “इंदिरा हटाओ”।
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गठबंधन: कांग्रेस (R) ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के साथ गठबंधन किया।
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परिणाम: इंदिरा गांधी की रणनीति सफल रही।
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कांग्रेस (R): 352 सीटें जीतीं।
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CPI के साथ गठबंधन: 375 सीटें (कुल वोटों का 48.4%)।
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ग्रैंड अलायंस: केवल 40 सीटें जीत सका।
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निष्कर्ष: कांग्रेस प्रणाली की पुनर्स्थापना हुई, लेकिन यह पुनर्स्थापना पुरानी कांग्रेस नहीं थी। यह एक ‘नई कांग्रेस प्रणाली’ थी, जो एक ही नेता (इंदिरा गांधी) पर निर्भर थी और इसकी सामाजिक नींव पहले से अधिक संकीर्ण थी।
कांग्रेस प्रणाली की पुनर्स्थापना (Restoration of Congress System)
1971 के चुनाव ने भारतीय राजनीति पर इंदिरा गांधी के प्रभुत्व की मुहर लगा दी।
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अभूतपूर्व जीत: 1971 की जीत ने इंदिरा गांधी को अत्यंत शक्तिशाली बना दिया। 1971 के बाद, भारतीय राजनीति में केंद्र की प्रमुखता और प्रधानमंत्री पद की शक्ति में अभूतपूर्व वृद्धि हुई।
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बांग्लादेश संकट: 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध में भारत की जीत और बांग्लादेश का निर्माण उनकी लोकप्रियता के शिखर पर था। इससे विपक्षी दल पूरी तरह से धराशायी हो गए।
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राज्य विधानसभा चुनाव (1972): लोकसभा चुनाव में मिली सफलता के बाद 1972 के विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस ने शानदार जीत दर्ज की।
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प्रभुत्व का नया स्वरूप: पुरानी कांग्रेस एक समावेशनकारी (Consensus-oriented) दल थी, जहाँ विभिन्न गुटों को जगह मिलती थी। नई कांग्रेस एक केंद्रीकृत (Centralized) पार्टी थी, जो एक ही नेता (इंदिरा गांधी) के इर्द-गिर्द घूमती थी, और जिसने समाजवादी झुकाव वाली नीतियों को अपनाया।
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लोकप्रियता का आधार: इंदिरा गांधी की लोकप्रियता किसी संगठनात्मक संरचना पर नहीं, बल्कि सीधे जनता के साथ उनके भावनात्मक जुड़ाव पर आधारित थी।
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