लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट (CH-6) Notes in Hindi || Class 12 Political Science Book 2 Chapter 6 in Hindi ||

पाठ – 6

लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट

In this post we have given the detailed notes of Class 12 Political Science Book 2 Chapter 6 लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट (Crisis of Democratic Order) in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 12 exams.

इस पोस्ट में कक्षा 12 राजनीति विज्ञान पुस्तक 2 के पाठ 6 लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट (Crisis of Democratic Order) के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 12 में है एवं सामाजिक विज्ञान विषय पढ़ रहे है।

BoardCBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board
TextbookNCERT
ClassClass 12
SubjectPolitical Science Book 2
Chapter no.Chapter 6
Chapter Nameलोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट (Crisis of Democratic Order)
CategoryClass 12 Political Science Notes in Hindi
MediumHindi
Class 12 Political Science Book 2 Chapter 6 लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट (Crisis of Democratic Order) in Hindi
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2 लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट

लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट (Crisis of Democratic Order)

परिचय: तनाव और बढ़ता असंतोष (1971 के बाद)

1971 के चुनाव में इंदिरा गांधी की शानदार जीत और ‘गरीबी हटाओ’ के नारे से देश में उत्साह था, लेकिन जल्द ही आर्थिक और राजनीतिक तनाव बढ़ने लगा, जिससे लोकतांत्रिक व्यवस्था संकट में आ गई।

a. आर्थिक संदर्भ

  • युद्ध और संकट: 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध और बांग्लादेश संकट ने भारत की अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ डाला।

  • अंतर्राष्ट्रीय कीमतें: अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि हुई (1973 का तेल संकट), जिससे भारत में मुद्रास्फीति (Inflation) बहुत बढ़ गई।

  • गरीबी और बेरोजगारी: सरकार के समाजवादी कार्यक्रमों के बावजूद गरीबी और बेरोजगारी कम नहीं हुई, जिससे जनता में असंतोष बढ़ा।

  • हड़तालें: सरकारी कर्मचारियों ने वेतन और भत्तों में वृद्धि के लिए हड़तालें कीं।

b. गैर-संसदीय विरोध

संसदीय राजनीति में कांग्रेस का प्रभुत्व था, इसलिए विपक्षी दलों ने दबाव बनाने के लिए गैर-संसदीय साधनों का सहारा लिया।

  • नक्सलवादी आंदोलन: पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी क्षेत्र से शुरू हुआ यह आंदोलन (1967) सरकार की आर्थिक नीतियों और भूमि सुधार की विफलता के खिलाफ था।

  • छात्र और मजदूर आंदोलन: देश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन हुए, जिनमें छात्र और मजदूर सबसे आगे थे।

गुजरात और बिहार आंदोलन (जेपी आंदोलन)

जनता के असंतोष को संगठित करने में दो छात्र आंदोलनों ने निर्णायक भूमिका निभाई, जिसका नेतृत्व बाद में जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने किया।

आंदोलन

गुजरात आंदोलन (1974)

बिहार आंदोलन (1974)

कारण

बढ़ती कीमतें, खाद्य तेलों की कमी, भ्रष्टाचार।

बढ़ती कीमतें, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार।

मांग

राज्य सरकार (कांग्रेस) से इस्तीफ़ा और नए चुनाव।

सरकार बर्खास्त करने और नए चुनाव की मांग।

नेतृत्व

विपक्षी दलों और छात्रों ने सरकार पर इस्तीफ़ा देने के लिए दबाव बनाया। मोरारजी देसाई ने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल की।

जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने आंदोलन का नेतृत्व संभाला। उन्होंने राजनीति में सुधार के लिए छात्रों से ‘संपूर्ण क्रांति’ का आह्वान किया।

प्रभाव

1974 में गुजरात में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया और 1975 में नए चुनाव हुए, जिसमें कांग्रेस हार गई।

जेपी आंदोलन ने राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष को एकजुट किया और इंदिरा गांधी के इस्तीफे की मांग की।

संपूर्ण क्रांति का आह्वान: जयप्रकाश नारायण ने सरकार को हटाने के लिए समाज के हर वर्ग, खासकर युवाओं से सहयोग मांगा। उनका मानना था कि केवल सरकार बदलना ही काफी नहीं है, बल्कि समाज और व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव लाना ज़रूरी है।

न्यायपालिका के साथ संघर्ष

इंदिरा गांधी की सरकार और न्यायपालिका के बीच तीन प्रमुख संवैधानिक मुद्दों पर संघर्ष उत्पन्न हुआ:

संघर्ष के मुद्दे

इंदिरा गांधी सरकार का दृष्टिकोण (संसद की सर्वोच्चता)

न्यायपालिका का दृष्टिकोण (संविधान की सर्वोच्चता)

मौलिक अधिकार

सरकार का मानना था कि सामाजिक-आर्थिक नीतियों को लागू करने के लिए मौलिक अधिकारों को सीमित किया जा सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि संसद मौलिक अधिकारों में कटौती नहीं कर सकती।

प्रिवी पर्स

सरकार ने ‘प्रिवी पर्स’ (राजाओं को विशेष भत्ते) को समाप्त करने का प्रयास किया (1970)।

सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार के इस प्रयास को असंवैधानिक घोषित किया (हालांकि इसे बाद में समाप्त कर दिया गया)।

संसद की शक्ति

सरकार ने संविधान में संशोधन करके संसद की शक्ति को बढ़ाने की कोशिश की, ताकि वह मौलिक अधिकारों में संशोधन कर सके।

केशवानंद भारती केस (1973): सर्वोच्च न्यायालय ने ‘संविधान के मूल ढाँचे’ का सिद्धांत दिया। कोर्ट ने कहा कि संसद संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन कर सकती है, लेकिन ‘मूल ढाँचे’ (जैसे लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, संघीय ढांचा) को नहीं बदल सकती।

न्यायाधीशों की वरिष्ठता की अवहेलना: सरकार ने केशवानंद भारती मामले के ठीक बाद, तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों की अनदेखी करते हुए, ए.एन. रे को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया, जिससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल उठे।

आपातकाल की घोषणा (जून 1975)

आपातकाल की घोषणा की पृष्ठभूमि में दो मुख्य घटनाएँ थीं:

a. इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला

  • मामला: समाजवादी नेता राज नारायण ने 1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी की जीत को चुनौती दी थी।

  • फैसला (12 जून 1975): इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध घोषित कर दिया। इसका मतलब था कि वे अब सांसद नहीं रहीं और अगले 6 साल तक चुनाव नहीं लड़ सकती थीं।

b. जेपी का राष्ट्रव्यापी आह्वान

  • 25 जून 1975 को जयप्रकाश नारायण ने दिल्ली के रामलीला मैदान में एक विशाल रैली में सेना, पुलिस और सरकारी कर्मचारियों से गैर-संवैधानिक और अनैतिक आदेशों को न मानने का आह्वान किया।

  • इसके ठीक बाद, इंदिरा गांधी ने स्थिति से निपटने के लिए कदम उठाए।

c. आपातकाल लागू करना

  • घोषणा की तिथि: 25 जून 1975 की मध्यरात्रि।

  • राष्ट्रपति: फखरुद्दीन अली अहमद ने प्रधानमंत्री की सलाह पर आपातकाल की घोषणा की।

  • संवैधानिक प्रावधान: संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत ‘आंतरिक अशांति’ के आधार पर आपातकाल लगाया गया।

  • तत्काल प्रभाव:

    1. विपक्षी नेताओं को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया।

    2. प्रेस की स्वतंत्रता समाप्त कर दी गई (सेंसरशिप लागू)।

    3. नागरिकों के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 19) निलंबित कर दिए गए।

आपातकाल के परिणाम और विवाद (Controversies)

आपातकाल 21 महीने तक (जून 1975 से जनवरी 1977 तक) लागू रहा।

a. मौलिक अधिकारों का निलंबन

  • आपातकाल में अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) सहित मौलिक अधिकारों के कार्यान्वयन के लिए न्यायालय में जाने का नागरिकों का अधिकार निलंबित कर दिया गया था।

  • बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeas Corpus): सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के इस कदम का समर्थन किया, जिससे नागरिकों को कानूनी सुरक्षा मिलना लगभग बंद हो गया।

b. सेंसरशिप (Censorship)

  • समाचार पत्रों को कोई भी खबर छापने से पहले सरकारी अनुमति लेनी होती थी।

  • विरोध जताने के लिए कई अखबारों ने संपादकीय की जगह खाली छोड़ दी।

  • आरएसएस और जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

c. सरकारी ज्यादतियाँ (Excesses)

  • वरिष्ठ अधिकारियों के आदेश पर बड़े पैमाने पर मनमाने ढंग से गिरफ्तारियाँ हुईं।

  • पुलिस द्वारा अत्यधिक बल का प्रयोग और यातना।

  • दिल्ली के तुर्कमान गेट इलाके में गरीबों की बस्तियों को हटाने के लिए जबरन विस्थापन।

  • जबरन नसबंदी (Forced Sterilisation): संजय गांधी के नेतृत्व में जनसंख्या नियंत्रण के लिए बड़े पैमाने पर और जबरन नसबंदी कार्यक्रम चलाया गया, जो सबसे विवादास्पद कदम था।

1977 के चुनाव और जनता पार्टी का उदय

आपातकाल के बाद इंदिरा गांधी ने जनवरी 1977 में चुनाव कराने का फैसला किया और सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा कर दिया गया।

a. विपक्ष की एकता

  • आपातकाल विरोधी लहर को भुनाने के लिए, सभी प्रमुख विपक्षी दलों (जनसंघ, ​​समाजवादी पार्टी, कांग्रेस-ओ, लोकदल) ने एकजुट होकर जनता पार्टी का गठन किया।

  • जनता पार्टी ने 1977 के चुनाव को ‘लोकतंत्र बचाओ’ के नारे पर लड़ा, जबकि कांग्रेस (R) ने विकास और स्थिरता की बात की।

b. चुनाव परिणाम (1977)

पहलू

परिणाम

कांग्रेस की हार

पहली बार केंद्र में कांग्रेस को हार मिली। इंदिरा गांधी और संजय गांधी दोनों चुनाव हार गए।

जनता पार्टी की जीत

जनता पार्टी और उसके सहयोगियों को कुल 330 सीटें मिलीं (जनता पार्टी अकेले 295)।

क्षेत्रीय अंतर

उत्तर भारत में कांग्रेस लगभग साफ़ हो गई, जबकि दक्षिण भारत के राज्यों (केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक) में उसे कुछ सफलता मिली।

नई सरकार

मोरारजी देसाई जनता पार्टी के पहले प्रधानमंत्री बने।

c. जनता पार्टी सरकार की असफलता

  • जनता पार्टी की सरकार दो साल से अधिक नहीं चल पाई।

  • इसके पतन के मुख्य कारण थे:

    1. नेतृत्व का संघर्ष: मोरारजी देसाई, चरण सिंह और जगजीवन राम के बीच प्रधानमंत्री पद को लेकर आंतरिक कलह।

    2. विचारधारा की कमी: विभिन्न विचारधाराओं के दलों का यह गठबंधन केवल कांग्रेस-विरोध पर आधारित था, जिससे आंतरिक सामंजस्य की कमी थी।

    3. कांग्रेस (I) की वापसी: 1980 के मध्यवधि चुनावों में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस (I) ने प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की।

आपातकाल का सबक

  • शाह आयोग (Shah Commission): जनता पार्टी की सरकार ने आपातकाल के दौरान हुई ज्यादतियों की जाँच के लिए न्यायमूर्ति जे.सी. शाह की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया।

  • लोकतंत्र की ताकत: आपातकाल ने यह साबित कर दिया कि भारतीय लोकतंत्र बहुत गहरा और मज़बूत है और इसे आसानी से निरस्त नहीं किया जा सकता।

  • संवैधानिक जागरूकता: ‘आंतरिक अशांति’ अस्पष्ट थी। इसके बाद संविधान में 44वाँ संशोधन (1978) किया गया, जिसने ‘आंतरिक अशांति’ शब्द को हटाकर उसके स्थान पर ‘सशस्त्र विद्रोह’ शब्द डाला, जिससे आपातकाल लगाना अधिक कठिन हो गया।

  • मौलिक अधिकारों का महत्त्व: यह सुनिश्चित किया गया कि आपातकाल के दौरान भी अनुच्छेद 20 और 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) के तहत दिए गए मौलिक अधिकारों को निलंबित नहीं किया जा सकता।

  • विपक्ष की भूमिका: आपातकाल के बाद विपक्ष की एकता भारतीय राजनीति का एक स्थायी हिस्सा बन गई।

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