क्षेत्रीय आकांक्षाएँ (CH-7) Notes in Hindi || Class 12 Political Science Book 2 Chapter 7 in Hindi ||

पाठ – 7

क्षेत्रीय आकांक्षाएँ

In this post we have given the detailed notes of Class 12 Political Science Book 2 Chapter 7 क्षेत्रीय आकांक्षाएँ (Regional Aspirations) in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 12 exams.

इस पोस्ट में कक्षा 12 राजनीति विज्ञान पुस्तक 2 के पाठ 7 क्षेत्रीय आकांक्षाएँ (Regional Aspirations) के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 12 में है एवं सामाजिक विज्ञान विषय पढ़ रहे है।

BoardCBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board
TextbookNCERT
ClassClass 12
SubjectPolitical Science Book 2
Chapter no.Chapter 7
Chapter Nameक्षेत्रीय आकांक्षाएँ (Regional Aspirations)
CategoryClass 12 Political Science Notes in Hindi
MediumHindi
Class 12 Political Science Book 2 Chapter 7 क्षेत्रीय आकांक्षाएँ (Regional Aspirations) in Hindi
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2 क्षेत्रीय आकांक्षाएँ
2.1 क्षेत्रीय आकांक्षाएँ (Regional Aspirations)

क्षेत्रीय आकांक्षाएँ (Regional Aspirations)

क्षेत्रीय आकांक्षाओं का उदय

स्वतंत्रता के बाद से ही, भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था को अलग-अलग क्षेत्रों की राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक आकांक्षाओं को समायोजित करने की चुनौती का सामना करना पड़ा है।

a. क्षेत्रीय आकांक्षा का अर्थ

क्षेत्रीय आकांक्षा का तात्पर्य एक विशेष क्षेत्र या भाषाई समूह के लोगों द्वारा अपनी पहचान, संस्कृति, भाषा और आर्थिक विकास के लिए राजनीतिक शक्ति और स्वायत्तता (Autonomy) की मांग करना है।

b. भारतीय दृष्टिकोण

  • भारत में क्षेत्रीय आकांक्षाओं को राष्ट्र-विरोधी या अलगाववादी के रूप में नहीं देखा जाता है।

  • अधिकांश क्षेत्रीय आंदोलन देश के संवैधानिक ढांचे के भीतर अपनी स्वायत्तता और पहचान की मांग करते हैं।

  • नेताओं ने हमेशा बातचीत और लोकतांत्रिक तरीकों से इन मांगों को पूरा करने का प्रयास किया है, जिससे ‘विविधता में एकता’ को बल मिलता है।

क्षेत्रीय आकांक्षाओं के कारण

क्षेत्रीय आकांक्षाओं के उदय के कई कारण हैं:

कारण

विवरण

भाषाई और सांस्कृतिक पहचान

विभिन्न भाषाई समूहों ने अपनी संस्कृति, भाषा और इतिहास को संरक्षित करने के लिए अलग राज्यों की मांग की (जैसे आंध्र प्रदेश)।

आर्थिक पिछड़ापन

यदि कोई क्षेत्र या राज्य विकास के मामले में पिछड़ जाता है, तो वहाँ के लोग संसाधनों के असमान वितरण के कारण अलगाव या स्वायत्तता की मांग करते हैं।

केंद्र का प्रभुत्व

यदि केंद्र सरकार राज्य के मामलों में बहुत अधिक हस्तक्षेप करती है, तो राज्यों में स्वायत्तता की भावना मजबूत होती है।

संघीय सिद्धांत का महत्त्व

विभिन्न क्षेत्रों के लोग संघवाद के सच्चे अर्थों में शक्ति के विकेंद्रीकरण की मांग करते हैं।

प्रमुख क्षेत्रीय आंदोलन और संघर्ष

भारत में क्षेत्रीय आकांक्षाएँ अलग-अलग रूप में सामने आईं, जिनमें से तीन प्रमुख क्षेत्रों के संघर्षों का अध्ययन महत्वपूर्ण है।

A. जम्मू-कश्मीर की स्थिति

जम्मू-कश्मीर की समस्या मुख्य रूप से तीन कारकों से उत्पन्न हुई है: राज्य का विशेष दर्जा, लोकतांत्रिक व्यवस्था और पाकिस्तान के साथ विवाद।

a. विवाद के तीन पहलू

  1. कश्मीर क्षेत्र: यह मानता है कि कश्मीर केवल कश्मीरियों का है।

  2. भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद: कश्मीर पर भारत और पाकिस्तान दोनों अपना दावा करते हैं।

  3. आंतरिक क्षेत्रीय विवाद: जम्मू, कश्मीर घाटी और लद्दाख के लोगों की अलग-अलग आकांक्षाएँ हैं।

b. प्रारंभिक स्थिति और विलय

  • विलय पत्र (Instrument of Accession): 1947 में, महाराजा हरिसिंह ने पाकिस्तान के साथ संघर्ष के बाद भारत में विलय के लिए सहमति दी।

  • धारा 370: विलय के साथ ही जम्मू-कश्मीर को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत विशेष दर्जा दिया गया, जिसने इसे अन्य राज्यों की तुलना में अधिक स्वायत्तता प्रदान की।

c. लोकतांत्रिक प्रक्रिया और अलगाववाद

  • शेख अब्दुल्ला: वे कश्मीर के पहले प्रधानमंत्री बने और बाद में उन्हें केंद्र सरकार के साथ मतभेद के कारण बर्खास्त कर दिया गया (1953)।

  • चुनाव में धांधली: 1953 के बाद से हुए कई चुनाव (विशेषकर 1987) में धांधली के आरोपों से लोगों का भारतीय लोकतंत्र पर भरोसा कम हुआ।

  • अलगाववाद का उदय: 1989 के बाद, अलगाववादी संगठन सक्रिय हो गए और उन्होंने सशस्त्र विद्रोह शुरू कर दिया। वे कश्मीर की आजादी या पाकिस्तान में विलय की मांग करने लगे।

d. वर्तमान स्थिति

  • अगस्त 2019: भारत सरकार ने अनुच्छेद 370 को समाप्त कर दिया और जम्मू-कश्मीर राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों (जम्मू-कश्मीर और लद्दाख) में विभाजित कर दिया।

 

B. पंजाब और खालिस्तान आंदोलन

पंजाब में क्षेत्रीय आकांक्षाओं ने धार्मिक और राजनीतिक रूप धारण किया, जिसका सबसे हिंसक रूप खालिस्तान आंदोलन था।

a. भाषाई पुनर्गठन

  • 1966 में, पंजाब राज्य को भाषाई आधार पर पुनर्गठित किया गया। पंजाबी भाषी क्षेत्र को पंजाब, हिंदी भाषी क्षेत्र को हरियाणा, और पहाड़ी क्षेत्रों को हिमाचल प्रदेश में मिला दिया गया।

b. अकाली दल की मांगें

  • 1970 के दशक में, अकाली दल ने आनंदपुर साहिब प्रस्ताव (1973) के तहत निम्नलिखित माँगे रखीं:

    1. पंजाब को अधिक स्वायत्तता मिले।

    2. चंडीगढ़ को केवल पंजाब की राजधानी बनाया जाए।

    3. पंजाबी भाषी क्षेत्रों को पंजाब में मिलाया जाए।

c. चरमपंथी तत्वों का उदय

  • जरनैल सिंह भिंडरांवाले: 1980 के दशक में, भिंडरांवाले के नेतृत्व में एक कट्टरपंथी समूह सक्रिय हुआ, जिसने एक अलग सिख राष्ट्र ‘खालिस्तान’ की मांग की।

  • हिंसा का दौर: भिंडरांवाले के अनुयायियों ने स्वर्ण मंदिर (अमृतसर) को अपना मुख्यालय और हथियारों का जखीरा बना लिया।

d. ऑपरेशन ब्लू स्टार (Operation Blue Star)

  • जून 1984: सरकार ने आतंकवादियों को बाहर निकालने के लिए स्वर्ण मंदिर में ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ नामक सैन्य कार्रवाई की।

  • परिणाम: इस कार्रवाई में भिंडरांवाले मारा गया, लेकिन इससे सिख समुदाय की भावनाएं आहत हुईं और हिंसा बढ़ गई।

  • इंदिरा गांधी की हत्या: 31 अक्टूबर 1984 को, इंदिरा गांधी की हत्या उनके ही दो सिख अंगरक्षकों ने कर दी। इसके बाद दिल्ली और देश के कई हिस्सों में सिखों के खिलाफ भयानक हिंसा (दंगे) भड़क उठी।

e. शांति की ओर

  • राजीव-लोंगोवाल समझौता (1985): प्रधानमंत्री राजीव गांधी और अकाली दल के नेता संत हरचंद सिंह लोंगोवाल के बीच शांति समझौता हुआ, जिसके तहत पंजाब को चंडीगढ़ देने और कुछ अन्य मांगे मानने का वादा किया गया। (हालांकि बाद में लोंगोवाल की हत्या कर दी गई)।

  • 1990 के दशक के मध्य तक खालिस्तान आंदोलन समाप्त हो गया और राज्य में शांति बहाल हुई।

पूर्वोत्तर भारत में क्षेत्रीय आकांक्षाएँ

पूर्वोत्तर भारत (Seven Sisters and Sikkim) में क्षेत्रीय आकांक्षाओं की समस्या बहुत जटिल और पुरानी है, जो मुख्य रूप से भौगोलिक अलगाव, जनजातीय विविधता और बाहरी लोगों के खिलाफ विरोध पर आधारित है।

a. विशिष्ट समस्याएँ

  1. भौगोलिक अलगाव: शेष भारत से कटा हुआ होना।

  2. अंतर्राष्ट्रीय सीमाएँ: कई देशों से सटी सीमाएँ (चीन, म्यांमार, बांग्लादेश)।

  3. जनजातीय विविधता: 80% से अधिक जनजातियाँ और भाषाई समूह।

  4. संसाधनों की कमी और पिछड़ापन: आर्थिक विकास की धीमी गति।

  5. बाहरी लोगों के खिलाफ विरोध: असम में बाहरी लोगों (बांग्लादेशी प्रवासियों) के खिलाफ बड़े आंदोलन।

b. नागालैंड और मिजोरम में अलगाववाद

  • नागालैंड: अंगामी जापू फिजो के नेतृत्व में ‘नागा नेशनल काउंसिल (NNC)’ ने 1951 में स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। नागा अलगाववादी आंदोलन एक लंबे संघर्ष के बाद, केंद्र सरकार ने नागालैंड राज्य का निर्माण किया (1963)।

  • मिजोरम: मिज़ो नेशनल फ्रंट (MNF) का गठन लालडेंगा ने किया था। 1966 में MNF ने आजादी की मांग करते हुए सशस्त्र विद्रोह शुरू कर दिया।

    • मिजोरम शांति समझौता (1987): 20 साल के संघर्ष के बाद, केंद्र और MNF के बीच शांति समझौता हुआ। मिजोरम को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला और लालडेंगा मुख्यमंत्री बने। यह भारतीय लोकतंत्र की एक बड़ी सफलता थी।

c. असम आंदोलन (बाहरी लोगों के विरुद्ध)

  • कारण: असम में बांग्लादेश से आने वाले अवैध प्रवासियों की बड़ी संख्या के कारण स्थानीय लोगों को अपनी पहचान, संस्कृति और रोजगार के छिन जाने का डर था।

  • आंदोलन: ‘अखिल असम छात्र संघ (AASU)’ ने 1979 से 1985 तक एक लंबा और सफल आंदोलन चलाया, जिसका मुख्य नारा था: “विदेशी घुसपैठियों को बाहर निकालो।”

  • असम समझौता (1985): केंद्र सरकार और AASU के बीच समझौता हुआ। विदेशी नागरिकों की पहचान करने और उन्हें निर्वासित करने पर सहमति बनी।

  • असम गण परिषद (AGP): आंदोलन के नेताओं ने एक राजनीतिक पार्टी (AGP) बनाई और 1985 में चुनाव जीता।

नए राज्यों की मांग

बड़ी क्षेत्रीय आकांक्षाओं के अलावा, छोटे राज्यों की मांग भी भारत की राजनीति का हिस्सा रही है।

मांग

परिणाम

भाषाई आधार पर

1950 के दशक में भाषाई पुनर्गठन के तहत कई नए राज्य बने।

क्षेत्रीय/जनजातीय आधार

1970 और 1980 के दशक में पूर्वोत्तर में कई छोटे राज्य बनाए गए (जैसे मेघालय, त्रिपुरा, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश)।

विकास के आधार पर

नए राज्यों की मांग अक्सर विकास के असंतुलन के कारण होती है।

हालिया निर्माण (2000)

उत्तराखंड (उत्तर प्रदेश से), झारखंड (बिहार से), छत्तीसगढ़ (मध्य प्रदेश से)।

तेलंगाना (2014)

आंध्र प्रदेश के विभाजन से अलग तेलंगाना राज्य बना।

क्षेत्रीय आकांक्षाओं से सबक

भारत में क्षेत्रीय आकांक्षाओं के उदय और समाधान से कई महत्वपूर्ण सबक मिले हैं:

  1. लोकतांत्रिक समाधान: क्षेत्रीय आकांक्षाओं को दबाने के बजाय, लोकतांत्रिक तरीके से बातचीत और समाधान से उन्हें राष्ट्रीय एकता में समाहित किया जा सकता है।

  2. शक्ति का विकेंद्रीकरण: यह साफ है कि केंद्र सरकार को राज्यों और क्षेत्रों को पर्याप्त स्वायत्तता देनी चाहिए।

  3. संघवाद की मजबूती: क्षेत्रीय आकांक्षाओं को मान्यता देने से देश की एकता को खतरा नहीं होता, बल्कि संघीय ढाँचा और अधिक मजबूत होता है।

  4. सर्वसम्मति का महत्त्व: संघर्षों के समाधान के लिए सरकार को सभी पक्षों के साथ बातचीत करके शांति समझौतों पर पहुँचना चाहिए (जैसे मिजोरम समझौता)।

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