पाठ – 3
निर्धनता: एक चुनौती
In this post we have given the detailed notes of class 9 SST (Economics) Chapter 3 निर्धनता: एक चुनौती (Poverty as a Challenge) in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 9 exams.
इस पोस्ट में कक्षा 9 के सामाजिक विज्ञान (अर्थशास्त्र) के पाठ 3 निर्धनता: एक चुनौती (Poverty as a Challenge) के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 9 में है एवं सामाजिक विज्ञान विषय पढ़ रहे है।
| Board | CBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board |
| Textbook | NCERT |
| Class | Class 9 |
| Subject | SST (Economics) |
| Chapter no. | Chapter 3 |
| Chapter Name | निर्धनता: एक चुनौती (Poverty as a Challenge) |
| Category | Class 9 SST (Economics) Notes in Hindi |
| Medium | Hindi |
परिचय
- दैनिक जीवन में हम कई ऐसे लोगों से मिलते हैं जिन्हें निर्धन समझते हैं, जैसे ग्रामीण भूमिहीन मजदूर या शहरी झुग्गियों में रहने वाले।
- नीति आयोग बहुआयामी निर्धनता सूचकांक का उपयोग करता है। बहुआयामी निर्धनों का अनुपात 2005-06 में 55% से घटकर 2015-16 में 25% और 2019-21 में 15% हो गया। आशा है कि बहुआयामी निर्धनता शीघ्र एकल अंक में आ जाएगी।
- निर्धनता से करोड़ों लोगों को बाहर निकालना स्वतंत्र भारत की बड़ी चुनौती रही। महात्मा गांधी कहते थे कि भारत सही अर्थों में तब स्वतंत्र होगा जब सबसे निर्धन व्यक्ति भी मानवीय व्यवस्था से मुक्त होगा।
निर्धनता के दो विशिष्ट मामले
शहरी स्थिति: राम सरन की कहानी
- राम सरन (33 वर्ष) झारखंड में रांची के निकट गेहूं की आटा मिल में दैनिक मजदूर। जब रोजगार मिलता है तो मासिक 3500 रुपये कमाता, लेकिन रोजगार स्थायी नहीं।
- परिवार: पत्नी और 6 माह से 12 वर्ष के 4 बच्चे। रामगढ़ के गांव में रहते बुजुर्ग माता-पिता को भी पैसे भेजता। पिता भूमिहीन मजदूर, भाई हजारीबाग में रहता।
- रहन-सहन: शहर के बाहरी क्षेत्र में भीड़भाड़ वाली बस्ती में किराए का कमरा (ईंट और मिट्टी का खंडहर)। पत्नी संता देवी कुछ घरों में पार्ट-टाइम नौकरानी, 1500 रुपये कमाती।
- भोजन: दिन में दो बार दाल-चावल, कभी पर्याप्त नहीं। बड़ा बेटा चाय की दुकान पर सहायक, 700 रुपये कमाता। 10 वर्ष की बेटी स्कूल जाती और छोटे भाई-बहनों की देखभाल करती।
- कपड़े: प्रत्येक के पास दो जोड़ी पुराने कपड़े, नए तब जब पुराने पूरी तरह फट जाएँ। जूते विलासिता। छोटी लड़की स्कूल में मिलने वाला दाल-चावल खाती।
ग्रामीण स्थिति: लखा सिंह की कहानी
- लखा सिंह उत्तर प्रदेश में मेरठ के पास गांव का निवासी। परिवार के पास कोई भूमि नहीं, बड़े किसानों के लिए छोटे-मोटे काम करता।
- काम अनियमित, आय भी वैसी ही। अधिकांशतः पूरे दिन की मजदूरी के बदले 200 रुपये, लेकिन अक्सर वस्तु रूप में कुछ किलो गेहूं, दाल या थोड़ी सब्जी।
- परिवार: 6 सदस्य, दिन में दो समय का भोजन भी मुश्किल से जुटा पाते। गांव के बाहर कच्ची झोपड़ी में रहता।
- महिलाएँ: पूरे दिन खेतों में चारा काटती या जलाने की लकड़ियाँ चुनती। पिता की उचित चिकित्सा के अभाव में 2 वर्ष पूर्व मृत्यु (तपेदिक के मरीज)। माँ उसी बीमारी से ग्रस्त, जीवन धीरे-धीरे क्षीण।
- शिक्षा: गांव में प्राथमिक स्कूल है, लेकिन लखा कभी नहीं गया। खुश है कि उसके बच्चे स्कूल जा रहे। नए कपड़े कुछ वर्षों में ही संभव। साबुन और तेल भी विलासिता।
- निर्धनता से संबंधित मुद्दे: भूमिहीनता, बेरोजगारी, परिवार का आकार, साक्षरता स्तर, खराब स्वास्थ्य/कुपोषण, असहायता।

सामाजिक वैज्ञानिकों की दृष्टि में निर्धनता
- निर्धनता के कई आयाम: भुखमरी, आश्रय की कमी, माता-पिता द्वारा बच्चों को तीन समय भोजन न दे पाना, बीमार व्यक्ति का इलाज न करा पाना, स्वच्छ पानी और सफाई का अभाव, नियमित रोजगार और न्यूनतम उचित मजदूरी का अभाव, असहाय जीवन।
- निर्धन खेतों, कारखानों, सरकारी कार्यालयों, अस्पतालों, रेलवे स्टेशनों आदि सभी जगह दुर्व्यवहार सहते हैं।
- सामाजिक वैज्ञानिक निर्धनता को कई सूचकों से देखते हैं: आय और उपभोग स्तर से संबंधित। हाल के वर्षों में अन्य सूचक: स्वास्थ्य (पोषण, बाल और किशोर मृत्युदर, मातृ स्वास्थ्य), शिक्षा (शिक्षा के वर्ष और स्कूल में उपस्थिति), जीवन स्तर (खाना पकाने का ईंधन, स्वच्छता, पेयजल, घर, बिजली, संपत्ति, बैंक खाता)।
- राष्ट्रीय बहुआयामी निर्धनता सूचकांक इन तीन व्यापक सूचकों पर आधारित।
- सामाजिक अपवर्जन: निर्धन लोग अपने जैसे लोगों के साथ मिलन बस्तियों में रहते, सामाजिक समानता से वंचित होकर संपन्न लोगों के वातावरण से अलग-थलग। सामान्य अर्थ में निर्धनता का कारण और परिणाम दोनों। यह प्रक्रिया जिसमें व्यक्ति या समूह सुविधाओं, लाभों और अवसरों से वंचित रहते जिनका अन्य लोग आनंद लेते हैं। उदाहरण: भारत में जाति व्यवस्था जहां कुछ जातियों को समान अवसरों से वंचित रखा जाता। आय कम होने से अधिक सामाजिक अपवर्जन के नुकसान।
- असुरक्षा: निर्धनता के प्रति असुरक्षा एक माप जो कुछ विशेष समुदायों (जैसे पिछड़ी जाति के सदस्य) या व्यक्तियों (जैसे विधवा या शारीरिक रूप से विकलांग व्यक्ति) के भावी वर्षों में निर्धन होने या निर्धन बने रहने की अधिक संभावना व्यक्त करता। असुरक्षा का निर्धारण संपत्तियों, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार अवसरों के रूप में जीविका खोजने के लिए विभिन्न समुदायों के पास उपलब्ध विकल्पों से होता। इसके अलावा प्राकृतिक आपदाओं (भूकंप, सुनामी) आदि मामलों में इन समूहों के सामने मौजूद बड़े जोखिमों के आधार पर विश्लेषण। अतिरिक्त विश्लेषण इन जोखिमों से निपटने की उनकी सामाजिक और आर्थिक क्षमता के आधार पर।
![विश्व में गरीबी रेखा से नीचे जनसंख्या [6460x3480] : r/MapPorn](https://i.redd.it/kq1cx27l00921.jpg)
विश्व में गरीबी रेखा से नीचे जनसंख्या
निर्धनता रेखा
- निर्धनता पर चर्चा का केंद्र: “निर्धनता रेखा” की अवधारणा।
- निर्धनता का आकलन एक सर्वमान्य सामान्य विधि: आय या उपभोग स्तरों पर आधारित।
- “उपभोग” का अर्थ: परिवार द्वारा विभिन्न मदों जैसे भोजन और वस्त्रों पर खर्च की गई राशि।
- व्यक्ति निर्धन तब माना जाता जब उसकी आय या उपभोग स्तर किसी ऐसे “न्यूनतम स्तर” से नीचे गिर जाए जो मूल आवश्यकताओं के एक दिए समूह को पूरा करने के लिए आवश्यक हो।
- मूल आवश्यकताएँ विभिन्न काल और विभिन्न देशों में भिन्न। इसलिए समय और स्थान के अनुसार निर्धनता रेखा भिन्न।
- प्रत्येक देश एक काल्पनिक रेखा का उपयोग करता जो विकास और उसके स्वीकृत न्यूनतम सामाजिक मानदंडों के वर्तमान स्तर के अनुरूप मानी जाती।
- उदाहरण: अमेरिका में जिस व्यक्ति के पास कार नहीं उसे निर्धन माना, जबकि भारत में अभी कार रखना विलासिता।
- कुछ वर्ष पूर्व तक भारत में निर्धनता रेखा का निर्धारण करते समय जीवन निर्वाह के लिए खाद्य आवश्यकता, कपड़ों, जूतों, ईंधन और बिजली, शैक्षिक और चिकित्सा संबंधी आवश्यकताओं आदि पर विचार किया जाता था।
- इन भौतिक मात्राओं को रुपयों में उनकी कीमतों से गुणा कर दिया जाता।
- निर्धनता रेखा का आकलन करते समय खाद्य आवश्यकता के लिए वर्तमान सूत्र वांछित कैलोरी आवश्यकताओं पर आधारित।
- खाद्य वस्तुएँ जैसे अनाज, दालें, सब्जियाँ, दूध, तेल, चीनी आदि मिलकर इस आवश्यक कैलोरी की पूर्ति करतीं।
- आयु, लिंग, काम करने की प्रकृति आदि के आधार पर कैलोरी की आवश्यकताएँ बदलती रहतीं।
- भारत में स्वीकृत कैलोरी आवश्यकता ग्रामीण क्षेत्रों में 2400 कैलोरी प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन एवं शहरी क्षेत्रों में 2100 कैलोरी प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन।
- क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग अधिक शारीरिक श्रम करते, इसलिए ग्रामीण क्षेत्रों में कैलोरी की आवश्यकता शहरी क्षेत्रों की तुलना में अधिक मानी गई।
- अनाज आदि के रूप में इन कैलोरी आवश्यकताओं को खरीदने के लिए प्रतिव्यक्ति मौद्रिक व्यय आदि और परिवारों द्वारा सूचित व्यय को निर्धनता रेखा के रूप में समझा गया।
- कीमतों में वृद्धि को ध्यान में रखते हुए समय-समय पर इस राशि को संशोधित किया जाता।
- वैश्विक विकासमानों के आधार पर भारत सरकार ने 12 विकासात्मक सूचकों का उपयोग करके भारत में निर्धनों के अनुपात का आकलन शुरू किया, जिसे प्रचलित रूप से बहुआयामी निर्धनता सूची (बॉक्स देखें) कहा जाता।

निर्धनता के अनुमान
- पूर्व खंड में वर्णित कार्यप्रणाली के आधार पर भारत में निर्धन लोगों की संख्या एवं अनुपात जिसे हेड काउंट रेशियो (HCR) कहते हैं, का आकलन होता है।
- तालिका 3-1 से यह स्पष्ट है कि 1990 के दशक के दौरान “उपभोग व्यय आधारित” निर्धनों का अनुपात 45 से गिरकर 37 प्रतिशत हो गया, हालांकि निर्धन लोगों की संख्या लगभग 40 करोड़ रही जिससे निर्धनों का अनुपात और संख्या दोनों ही कम हो गई।
- 2000-2011 के दौरान निर्धनों की संख्या एवं अनुपात, दोनों घट गए। 2015-21 के दौरान बहुआयामी निर्धनता दर घटकर 25 से 15 प्रतिशत हो गई।
- इस अवधि के दौरान अधिकाधिक अभिलेखों में 13.5 करोड़ लोग बहुआयामी निर्धनता से बाहर हो गए। विशेष रूप से कहें तो विभिन्न सूचकों के अंतर्गत निर्धनता ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी क्षेत्रों की तुलना में अधिक घटी।
- आरेख 3-1 से यह स्पष्ट है कि 1993-94 में निर्धनता अनुपात में गिरावट आने के बावजूद निर्धनों की संख्या 407 करोड़ के लगभग क्यों बनी रही?
- क्या भारत में निर्धनता में कमी के आंकड़े ग्रामीण और शहरी भारत में समान हैं?
अंतर्राष्ट्रीय असमानताएँ
- भारत में निर्धन लोगों का अनुपात प्रत्येक राज्य में एक समान नहीं (आरेख 3-1 देखें)।
- हालांकि 1970 के दशक के प्रारंभ से ही राज्य-स्तरीय निर्धनता में अत्यधिक कमी आई है। निर्धनता कम करने में सफलता की दर विभिन्न राज्यों में अलग-अलग रही।
- यह ध्यान देना आवश्यक होगा कि 2019-2021 के दौरान कर्नाटक, तमिलनाडु, दिल्ली, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश, हरियाणा एवं महाराष्ट्र में हेड काउंट रेशियो दस प्रतिशत से कम हुआ है।
- बीच में बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश एवं राजस्थान जैसे राज्य भी उल्लेखनीय प्रगति की।
- अध्ययनों से पता चलता है कि निर्धनता दूर करने के लिए राज्यों ने विभिन्न उपाय किए।
- उदाहरण: केरल ने मानव संसाधन विकास पर अत्यधिक ध्यान दिया। पश्चिम बंगाल में भूमि सुधार उपायों से।
- आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में अनाज के सार्वजनिक वितरण से सुधार हुए।
- आरेख 3-1 का अध्ययन करें और निम्नलिखित कार्य करें:
- तीन राज्यों की पहचान करें जहाँ हेड काउंट रेशियो सर्वाधिक है।
- तीन राज्यों की पहचान करें जहाँ हेड काउंट रेशियो सबसे कम है।
- उन राज्यों की सूची बनाएँ जहाँ हेड काउंट रेशियो कम है लेकिन भारत के हेड काउंट रेशियो से अधिक है।
असुरक्षित समूह
- निर्धनता रेखा से नीचे के लोगों का अनुपात भी भारत में सभी सामाजिक समूहों और आर्थिक वर्गों में एक समान नहीं।
- जो सामाजिक समूह निर्धनता के प्रति सर्वाधिक असुरक्षित हैं, वे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के परिवार हैं।
- इसी प्रकार आर्थिक समूहों में सर्वाधिक असुरक्षित समूह – ग्रामीण कृषि मजदूर परिवार और शहरी अनियमित मजदूर परिवार हैं।
- आरेख 3-2 इन सभी समूहों में निर्धन लोगों के प्रतिशत को दर्शाता है।
- हालांकि निर्धनता रेखा के नीचे के लोगों का औसत भारत में सभी समूहों के लिए 22 है। तथापि, अनुसूचित जनजातियों के 100 में से 43 लोग अपनी मूल आवश्यकताओं को पूरा करने में असमर्थ हैं (आरेख 3-2)।
- लगभग 34 प्रतिशत अनियमित मजदूर शहरी क्षेत्रों में निर्धनता रेखा के नीचे हैं।
- लगभग 34 प्रतिशत अनियमित श्रम मजदूर ग्रामीण क्षेत्र में और 29 प्रतिशत अनुसूचित जातियाँ भी निर्धन हैं।
- अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सामाजिक रूप से सुविधा वंचित सामाजिक समूहों का भूमिहीन अनियमित दिहाड़ी मजदूर होना उनकी दोहरी असुविधा की समस्या की गंभीरता को दर्शाता है।
- हाल के कुछ अध्ययनों ने दिखाया है कि 1990 के दशक के दौरान अनुसूचित जनजाति परिवारों को छोड़ कर अन्य सभी तीनों समूहों (अनुसूचित जाति, ग्रामीण कृषि श्रमिक और शहरी अनियमित मजदूर परिवार) की निर्धनता में कमी आई है।
- इन सामाजिक समूहों के अतिरिक्त परिवारों में भी आय असमानता दृष्टिगोचर है। निर्धन परिवारों में सभी लोगों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है लेकिन कुछ लोग दूसरों से अधिक कठिनाइयों का सामना करते हैं।
- लाभांश संदर्भों में महिलाओं, वृद्ध लोगों और बच्चों को परिवार के उपलब्ध संसाधनों पर समान रूप से अधिकार नहीं मिल पाता।
वैश्विक निर्धनता परिदृश्य
- क्या भारत में ही निर्धन लोग हैं? विकासशील देशों के बीच तुलना करने के लिए कई अंतर्राष्ट्रीय संगठन जैसे विश्व बैंक गरीबी रेखा के लिए एक समान मानक – $2.15 से कम प्रतिदिन की न्यूनतम उपलब्धता का उपयोग करते हैं।
- वैश्विक विकासमानों के आधार पर भारत में निर्धनों की संख्या में गिरावट इतनी ही तेज रही है और 2021 में 11.9% हो गया।
- वैश्विक निर्धनता में उल्लेखनीय गिरावट आई है लेकिन इसमें बड़ी क्षेत्रीय भिन्नताएँ भी पाई जाती हैं।
- तेज आर्थिक प्रगति और मानव संसाधन विकास में बड़े निवेश के कारण चीन और दक्षिण पूर्व एशिया के देशों में निर्धनता में विशेष कमी आई है (तालिका 3-2, आरेख 3-3 और 3-4 देखें)।
- चीन में निर्धनों का अनुपात वर्ष 2020 में 0.1 प्रतिशत हो गया।
- विश्व बैंक की रिपोर्ट्स दिखाती हैं कि दक्षिण एशिया के देशों (भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, बांग्लादेश, भूटान, अफगानिस्तान और मालदीव) में निर्धनों की संख्या में गिरावट इतनी ही तेज रही है और 2017 में 13 प्रतिशत से गिरकर 2021 में 11 प्रतिशत हो गई।
- निर्धनों के प्रतिशत में गिरावट के साथ ही निर्धनों की संख्या में भी अत्यधिक कमी आई है, जो 2017 में 233 मिलियन से घटकर 2021 में 207 मिलियन रह गई।
- सब-सहारा अफ्रीका में निर्धनता वास्तव में 2017 के 36.6 प्रतिशत से घटकर 2019 में 35 प्रतिशत हो गई (आरेख 3-3 देखें)।
- लैटिन अमेरिका और कैरिबियन में निर्धनता अनुपात रेखा 2017 में 4.4 प्रतिशत से बढ़ कर 2021 में 4.6 प्रतिशत हो गई।
- रूस जैसे पूर्व समाजवादी देशों में भी निर्धनता पुन: व्याप्त होकर 2000 में 3 प्रतिशत हो गई है, जहाँ पहले आधिकारिक रूप से कोई निर्धनता नहीं थी।
- आरेख 3-3 और 3-4 का अध्ययन कर निम्नलिखित कार्य करें:
- विश्व के उन क्षेत्रों की पहचान करें जहाँ निर्धनता अनुपात में गिरावट आई है।
- विश्व के उस क्षेत्र की पहचान करें जहाँ निर्धनों की संख्या सर्वाधिक है।
- विभिन्न देश विभिन्न गरीबी रेखाओं का उपयोग क्यों करते हैं?
निर्धनता और सतत विकास लक्ष्य
- संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा निर्धारित नए सतत विकास लक्ष्यों में 2030 तक सभी प्रकार की निर्धनता को समाप्त करने का प्रस्ताव रखा गया।
- यह लोगों और विश्व की समृद्धि के लिए एक साझा खाका प्रदान करता है जिससे भविष्य में निर्धनता समाप्त होगी। इसके केंद्र बिंदु में 17 सतत विकास लक्ष्य (SDGs) हैं।
- विकसित राष्ट्रों को विकासशील देशों की निर्धनता समाप्त करने, स्वास्थ्य एवं शिक्षा में सुधार करने, असमानता को समाप्त करने, जलवायु परिवर्तन का समाधान करने तथा सतत विकास को संवर्द्धित करने के प्रयास में सहायता करनी चाहिए।
- अपने शिक्षक की सहायता से प्रत्येक SDG का विवरण एकत्र करें। भारत या अपने राज्य द्वारा प्राप्त किए गए इन लक्ष्यों पर एक परियोजना रिपोर्ट तैयार करें।
निर्धनता के कारण
- भारत में व्यापक निर्धनता के अनेक कारण थे। एक ऐतिहासिक कारण ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन के दौरान आर्थिक विकास का निम्न स्तर।
- औपनिवेशिक सरकार की नीतियों ने पारंपरिक हस्तशिल्पकारों को नष्ट कर दिया और वस्त्र जैसे उद्योगों के विकास को हतोत्साहित किया।
- विकास की धीमी दर 1980 के दशक तक जारी रही। इसके परिणामस्वरूप रोजगार के अवसर घटे और आय की वृद्धि दर गिरी।
- इसके साथ-साथ जनसंख्या में उच्च दर से वृद्धि हुई।
- सिंचाई और हरित क्रांति के प्रसार से कृषि क्षेत्र में रोजगार के अनेक अवसर सृजित हुए।
- लेकिन इनका प्रभाव भारत के कुछ भागों तक ही सीमित रहा। सार्वजनिक और निजी, दोनों क्षेत्रों ने कुछ रोजगार उपलब्ध कराया।
- लेकिन ये रोजगार तलाश करने वाले सभी लोगों के लिए पर्याप्त नहीं हो सके। शहरों में उपयुक्त नौकरी पाने में असफल अनेक लोग रिक्शा चालक, वेंडर, घर निर्माण श्रमिक, घरेलू नौकर आदि के रूप में कार्य करने लगे।
- अनियमित और कम आय के कारण ये लोग उचित आवासों में नहीं रह सके। वे शहरों से बाहर झुग्गियों में रहने लगे और निर्धनता की समस्याएँ जो मुख्य रूप से एक ग्रामीण परिघटना थी, शहरी क्षेत्र की एक चुनौती बन गई।
- उच्च निर्धनता दर की एक और चुनौती आय असमानता रही। इसका एक प्रमुख कारण भूमि और अन्य संसाधनों का असमान वितरण।
- अनेक नीतियों के बावजूद हम किसी सार्थक ढंग से इस मुद्दे से नहीं निपट सके हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में संपत्तियों के पुनर्वितरण पर लक्षित भूमि सुधार जैसे प्रमुख नीति-उपक्रम को अधिकतर राज्य सरकारों ने प्रभावी ढंग से कार्यान्वित नहीं किया।
- इस नीति के उचित कार्यान्वयन से करोड़ों ग्रामीण निर्धनों का जीवन सुधारका जा सकता था।
- अनेक अन्य सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक कारक भी निर्धनता के लिए उत्तरदायी हैं।
- अतिनिर्धनों सहित भारत में लोग सामाजिक दायित्वों और धार्मिक अनुष्ठानों के आयोजन में बहुत पैसा खर्च करते हैं।
- छोटे किसानों को बीज, उर्वरक, कीटनाशकों जैसे कृषि इनपुट्स की खरीदारी के लिए धनराशि की जरूरत होती है।
- क्योंकि निर्धन कठिनाई से ही कोई बचत कर पाते हैं, इसलिए वे ऋण लेते हैं। निर्धनता के चलते पुन: भुगतान करने में असमर्थता के कारण वे ऋणग्रस्त हो जाते हैं।
- इसलिए अत्यधिक ऋणग्रस्तता निर्धनता का कारण और परिणाम दोनों है।
- अपने आस-पास के कुछ निर्धन परिवारों का अवलोकन करें और यह पता लगाने का प्रयास करें कि:
- वे किस सामाजिक और आर्थिक समूह से संबंधित हैं?
- परिवार में कमाने वाले सदस्य कौन हैं?
- परिवार में वृद्धों की स्थिति क्या है?
- क्या सभी बच्चे (लड़के और लड़कियाँ) विद्यालय जाते हैं?
निर्धनता निरोधक उपाय
- निर्धनता उन्मूलन भारत की विकास नीति का एक प्रमुख उद्देश्य रहा है। सरकार की वर्तमान निर्धनता-निरोधक रणनीति मोटे तौर पर दो कारकों (1) आर्थिक वृद्धि को प्रोत्साहन और (2) लक्षित निर्धनता-निरोधक कार्यक्रमों पर निर्भर है।
- 1980 के दशक के आरंभ तक समाप्त हुई 30 वर्ष की अवधि के दौरान प्रतिव्यक्ति आय में कोई विशेष वृद्धि नहीं हुई और निर्धनता में भी अधिक कमी नहीं आई।
- 1950 के दशक के आरंभ में आधिकारिक निर्धनता अनुमान 45 प्रतिशत का था और 1980 के दशक के आरंभ में भी वही बना रहा।
- 1980 के दशक से भारत की आर्थिक वृद्धि-दर विश्व में सबसे अधिक रही। 1970 के दशक के करीब वृद्धि-दर 3.5 प्रतिशत के औसत से बढ़कर 1980 और 1990 के दशक में 6 प्रतिशत के करीब पहुँच गई।
- 21वीं सदी के दो दशकों में (2000-2020) तेजी से आर्थिक विकास हुआ है। विकास की उच्च दर ने निर्धनता को कम करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
- इसलिए यह स्पष्ट होता जा रहा है कि आर्थिक वृद्धि और निर्धनता उन्मूलन के बीच एक घनिष्ठ संबंध है।
- आर्थिक वृद्धि अवसरों को व्यापक बना देती है और मानव विकास में निवेश के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराती है।
- यह शिक्षा में निवेश से अधिक आर्थिक प्रतिफल पाने की आशा में लोगों को अपने बच्चों को लड़कियों सहित स्कूल भेजने के लिए प्रोत्साहित करती है।
- तथापि, यह संभव है कि आर्थिक विकास से सृजित अवसरों से निर्धन लोग प्रत्यक्ष लाभ नहीं उठा सकें।
- इसके अतिरिक्त कृषि क्षेत्र में वृद्धि अपेक्षा से बहुत कम रही। निर्धनता पर इसका प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ा क्योंकि निर्धन लोगों का एक बड़ा भाग गांव में रहता है और कृषि पर आश्रित है।
- इन परिस्थितियों में लक्षित निर्धनता-निरोधक कार्यक्रमों की स्पष्ट आवश्यकता है। हालांकि ऐसी अनेक योजनाएँ हैं, जिन्हें प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से निर्धनता कम करने के लिए बनाया गया है। इनमें से कुछ योजनाओं का उल्लेख करना यहाँ आवश्यक है।
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम 2005 (मनरेगा)
- उद्देश्य: ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका सुरक्षित करने हेतु हर घर के लिए कम से कम 100 दिनों का रोजगार उपलब्ध कराना।
- इसका उद्देश्य सतत विकास में मदद करना है ताकि सूखा, वनोन्मूलन एवं मृदा अपरदन जैसी समस्याओं से बचा जा सके।
- इस प्रावधान के तहत एक-तिहाई रोजगार महिलाओं के लिए सुरक्षित किया गया।
- अकुशल हस्त श्रमिकों के लिए मजदूरी दर को नियमित रूप से संशोधित किया जाता है।

प्रधानमंत्री पोषण शक्ति अभियान (पीएम पोषण)
- भारत सरकार का एक प्रमुख कार्यक्रम। इसे दो उद्देश्यों के लिए आरंभ किया गया:
- (i) बच्चों के लिए विशेषकर कैलोरी और प्रोटीन लेने की पोषण आवश्यकताओं में सुधार करना,
- (ii) स्कूल में अधिक से अधिक नामांकन करना तथा स्कूल छोड़ने की प्रवृत्ति का उन्मूलन करना।
- इस अभियान के अंतर्गत शामिल हैं: सरकारी स्कूल, सरकार द्वारा सहायता-प्राप्त स्कूल एवं शिक्षा के अधिकार अधिनियम के अंतर्गत विशेष प्रशिक्षण केंद्र में पढ़ने वाले 1 से 8वीं कक्षा के विद्यार्थी।
- यह अभियान स्थानीय सरकारों और विभिन्न सामुदायिक संगठनों की सहायता से चलाया जा रहा है।
- इस कार्यक्रम का उद्देश्य विशेषकर गरीब तबकों के निर्धन बच्चों को अधिक नियमित रूप से स्कूल भेजना और कक्षागत गतिविधियों में उनकी भागीदारी को बढ़ाना है।
प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान
- गर्भवती महिलाओं को अच्छी प्रसवपूर्व देखभाल सुविधा देकर प्रसूति और शिशु मृत्युदर को कम करने के उद्देश्य से 2016 में पूरे देश में शुरू।
- इस योजना के तहत सुरक्षित प्रसव कराने एवं बच्चा जन्मने की दिशा में कार्य करना था एवं लाभ में कमियों को दूर करना था ताकि लाभार्थियों को नियमित और लगातार इलाज मिलता रहे।
- ये सेवाएँ हर महीने की नौ तारीख को प्रदान की जाती हैं।
- इस कार्यक्रम में निजी चिकित्सकों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए एक व्यवस्थित दृष्टिकोण अपनाया गया है ताकि उन्हें इस योजना में सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं के साथ स्वेच्छा से कार्य करने के लिए प्रेरित किया जा सके।
प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (पीएमयूवाई)
- उद्देश्य: विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली महिलाओं को सशक्त बनाना। यह धुआँ-रहित रसोईघर बनाने में महिलाओं को मदद करता है ताकि उन्हें पारंपरिक विधियों, जैसे- कोयला, उपले या लकड़ी का उपयोग करने से बचाया जा सके।
- यह योजना 2016 में इस उद्देश्य के साथ आरंभ की गई कि जो महिलाएँ, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक रूप से पिछड़े घरों में खाना बनाने के लिए पारंपरिक विधियों, जैसे- कोयला, झाड़ या लकड़ी का उपयोग कर रही थीं, उन्हें स्वच्छ ईंधन (LPG गैस) देना था।
- इसके लक्षित लाभार्थी गरीबी रेखा (BPL) से नीचे के परिवारों, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, बनवासी और गरीब तबके के घरों के लोग हैं।
- LPG के उपयोग को प्रोत्साहित करने के लिए इस योजना में पहला रिफिल और स्टोव सहित पूर्णतः निःशुल्क कनेक्शन प्रदान किया जाता है।
- गत वर्षों में पूरे देश में LPG की खपत में वृद्धि हुई है।
- लैंगिक समानता को सुनिश्चित करने के लिए घरों की महिलाओं के नाम पर कनेक्शन जारी किए गए।
- इस योजना से वनों की कटाई तथा कोयला, उपले और लकड़ी के जलाने से सृजित कार्बन उत्सर्जन कम करके पर्यावरण अक्षयता को संवर्द्धित करना है।
- स्वच्छ ईंधन अर्थात LPG महिलाओं को खाना पकाने में लगने वाले समय की बचत करता है। वे अब सामाजिक एवं आर्थिक गतिविधियों में भाग ले सकती हैं।
भविष्य की चुनौतियाँ
- भारत में निर्धनता में निश्चित रूप से गिरावट आई है लेकिन प्रगति के बावजूद निर्धनता उन्मूलन भारत की एक सबसे बाध्यकारी चुनौती है।
- ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों और विभिन्न राज्यों में निर्धनता में व्यापक असमानता है।
- कुछ सामाजिक और आर्थिक समूह निर्धनता के प्रति अधिक असुरक्षित हैं।
- यह आशा की जा रही है कि निर्धनता उन्मूलन भारत को और बेहतर बनाएगा। यह मुख्यतः उच्च आर्थिक वृद्धि, सार्वभौमिक शिक्षा पर बल, जनसंख्या वृद्धि में गिरावट, महिलाओं और समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के बढ़ते सशक्तीकरण के कारण संभव हो सकेगा।
- लोगों के लिए निर्धनता की आय आधारित परिभाषा निर्धनता के सीमित पहलू को दर्शाती है। यह न्यूनतम जीवन निर्वाह के “यथोचित” स्तर की अपेक्षा जीवन निर्वाह के “न्यूनतम” स्तर के विषय में है।
- अनेक बुद्धिजीवियों ने इसका समर्थन किया है कि निर्धनता की अवधारणा का विस्तार “मानव निर्धनता” तक कर देना चाहिए।
- संभवतः बड़ी संख्या में लोग अपना भोजन जुटाने में समर्थ हों लेकिन क्या उनके पास शिक्षा है? या घर है? या स्वास्थ्य सेवा की सुविधा है? या रोजगार की सुरक्षा है? या आत्मविश्वास है? क्या वे जाति और लिंग आधारित भेदभाव से मुक्त हैं? क्या बाल श्रम की प्रथा अब भी प्रचलित है?
- विश्वव्यापी अनुभव बताते हैं कि विकास के साथ निर्धनता की परिभाषा भी बदलती है।
- इस अध्याय में हमने निर्धनता को मापने के विभिन्न दृष्टिकोणों को परखा है। नीति आयोग का राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक दिखाता है कि भारत में बहुआयामी निर्धनता का अनुपात कम हुआ है। यह हाल के वर्षों में सरकार द्वारा आरंभ किए गए विभिन्न उपायों के कारण संभव हुआ है। आपका क्या विचार है?
महत्वपूर्ण तथ्य और आंकड़े
- निर्धनता अनुमान (HCR): 1993-94 में 45%, 2004-05 में 37%, 2009-10 में 30%, 2011-12 में 22%।
- बहुआयामी निर्धनता अनुमान: 2015-16 में 25%, 2019-21 में 15%।
- वैश्विक: प्रतिदिन $2.15 से कम कमाने वाले 2010 में 16.27% से 2019 में 9.05%।
- क्षेत्रीय: चीन में 0.1% (2020), भारत में 11.9% (2021)।
- सामाजिक समूह: अनुसूचित जनजाति 43%, अनियमित मजदूर (शहरी) 34%, ग्रामीण कृषि मजदूर 34%, अनुसूचित जाति 29%।
- सतत विकास लक्ष्य: 2030 तक सभी प्रकार की निर्धनता समाप्त।
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