पाठ – 4
वन समाज और उपनिवेशवाद
In this post we have given the detailed notes of class 9 SST (History) Chapter 4 वन समाज और उपनिवेशवाद (Forest Society and Colonialism) in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 9 exams.
इस पोस्ट में कक्षा 9 के सामाजिक विज्ञान (इतिहास) के पाठ 4 वन समाज और उपनिवेशवाद (Forest Society and Colonialism) के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 9 में है एवं सामाजिक विज्ञान विषय पढ़ रहे है।
| Board | CBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board |
| Textbook | NCERT |
| Class | Class 9 |
| Subject | Class 9 SST (History) Notes in Hindi |
| Chapter no. | Chapter 4 |
| Chapter Name | वन समाज और उपनिवेशवाद (Forest Society and Colonialism) |
| Category | Class 9 SST (History) Notes in Hindi |
| Medium | Hindi |
परिचय
आधुनिक विश्व का उदय कैसे हुआ है, इस पर विचार करते हुए हम अक्सर कारखानों और शहरों पर तथा बाजार को आपूर्ति करने वाले औद्योगिक और कृषि क्षेत्रों पर ही ध्यान देते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि इन क्षेत्रों के बाहर दूसरी अर्थव्यवस्थाएं भी हैं, दूसरे लोग भी हैं जो राष्ट्र के लिए महत्व रखते हैं। आधुनिक दृष्टि से देखने पर ऐसा लगता है कि चरागाहों और वनवासियों, घुमंतू किसानों और खान की चीजें चीर कर गुजार करने वालों की जीवन पिछड़े में ही कहीं अटक कर रह गई है। समकालीन विश्व के उदय का अध्ययन करते हुए उनके प्रति हमारा रवैया कुछ ऐसा रहता है मानो उनकी जीवन का कोई महत्व ही न हो। खंड II के अध्यायों में इस बात को रेखांकित किया गया है कि हमें उनकी जीवन के बारे में जानना चाहिए, हमें देखना चाहिए कि वे अपनी दुनिया को कैसे व्यावस्थित करते हैं और कैसे अपनी रोटी-रोटी चलाते हैं। ये लोग भी पूरी तरह उसी दुनिया का हिस्सा हैं जिसमें हम आज रह रहे हैं। वे गुस्से हुए शर्माने के बचे-खुचे लोग नहीं हैं।
यहां आप देखेंगे कि जंगलों में रहने वाले विभिन्न समुदाय जंगलों का किस-किस रूप में उपयोग करते रहे हैं। यहां आपको पता चलेगा कि उन्नीसवीं सदी में उद्योग और शहरों, जहाजरानी और रेलवे के उदय और विस्तार से लकड़ी और अन्य वन उत्पादों के लिए जंगलों पर दबाव कितना बढ़ गया था। इन नई जरूरतों और मांगों के चलते जंगलों के उपयोग से संबंधित कार्य-कानून बदले गए और जंगलों के रखरखाव की एक नई पद्धति सामने आई। यहां औपनिवेशिक नियंत्रण कैसे कामयाब हुआ, कैसे वन क्षेत्रों को मापा गया, पेड़ों का वर्गीकरण किया गया और बागान विकसित किए गए, इस पर प्रकाश डाला गया है। इन सभी परिवर्तनों से वन संसाधनों का उपयोग करने वाले स्थानीय समुदायों की जीविका पर भी असर पड़ा। उन्हें नई व्यवस्था में काम करने और अपने जीवन को नए सिरे से संगठित करने के लिए मजबूर किया गया। लेकिन बहुतों ने इन नियमों और कानूनों के खिलाफ बगावत भी की और सरकारों को अपनी नीतियां बदलने के लिए मजबूर किया। इस अध्याय में आपको इस बात का अंदाजा मिलेगा कि भारत और इंडोनेशिया में इन परिवर्तनों का इतिहास क्या रहा है।
वनों का विनाश क्यों?
वनों के लुप्त होने को सामान्यतः वन-विनाश कहते हैं। वन-विनाश कोई नई समस्या नहीं है। वैसे तो यह प्रक्रिया कई सदियों से चली आ रही थी लेकिन औपनिवेशिक शासन के दौरान इसने कहीं अधिक संगठित और व्यापक रूप धारण कर लिया। आइए, भारत में वन-विनाश के कुछ कारणों पर गौर करें।
खेती की वृद्धि
सन् 1600 में हिंदुस्तान के कुल भू-भाग के लगभग छठे हिस्से पर खेती होती थी। आज यह आंकड़ा दोगुना हो चुका है। इन वर्षों के दौरान जैसे-जैसे आबादी बढ़ी और भोजन आपूर्ति की मांग में वृद्धि हुई, वैसे-वैसे किसानों ने वनों को काटकर खेती की सीमाओं को विस्तार दिया। औपनिवेशिक काल में खेती में तेजी से वृद्धि आई। इसके कई कारण थे। पहला, यूरोपीयों ने व्यापारिक फसलों जैसे जूट, गन्ना, गेहूं और कपास के उत्पादन को बढ़ावा दिया। अठारहवीं शताब्दी के दूसरे चतुर्थांश में बढ़ती शहरी आबादी का पेट भरने के लिए भोजन और औद्योगिक उत्पादन के लिए कच्चे माल की आवश्यकता थी। यूरोप में इन फसलों की मांग में वृद्धि हुई। दूसरा कारण यह था कि औपनिवेशिक सरकार ने वनों को राजस्व उत्पादक माना। उनके अनुसार इस धन के स्रोत पर खेती करके राज्य को राजस्व और कृषि उत्पाद प्रदान किया जा सकता था और इस तरह राज्य की आय में वृद्धि की जा सकती थी। यही कारण था कि 1880 से 1920 के बीच खेती योग्य भूमि के कुल क्षेत्र में 6.7 मिलियन हेक्टेयर की वृद्धि हुई। खेती के विस्तार को हम विकास का सूचक मानते हैं। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भूमि को जोतने से पहले वनों की कटाई करनी पड़ती है।
जहाज पर लकड़ी की मांग
किसी स्थान पर खेती न होने का मतलब उस जगह का असकृत होना नहीं है। जब यूरोपीय उपनिवेशवादी ऑस्ट्रेलिया पहुंचे तो उन्होंने दावा किया कि यह महाद्वीप खाली था। वास्तव में, ये स्वदेशी शिकार-संग्राहकों का क्षेत्र था, जो शिकार राज्य से इस भूमि में प्रवेश कर चुके थे। ऑस्ट्रेलिया के विभिन्न स्वदेशी समुदायों के अपने स्पष्ट संगठित क्षेत्र थे। ऑस्ट्रेलिया के नरिंदेरी (Ngarrindjeri) की अपनी भूमि संस्कृति थी जो उनके पहले पूर्वज, न्गुरुंदरि (Ngurunderi) के पौराणिक कथा जैसी थी। यह भूमि पांच विभिन्न प्राकृतिक प्रांतों को अपने में समेटे हुई थी – खारे पानी, समुद्रों, घास के मैदानों, वर्षावन मैदानों, उष्णकटिबंधीय मैदानों, जो विभिन्न सामाजिक-आर्थिक जरूरतों को पूरा करते थे।
अठारहवीं शताब्दी की शुरुआत तक ऑक और अन्य पेड़ों से जहाज बनाए जाते थे। लेकिन जैसे-जैसे साम्राज्यवाद बढ़ा, व्यापार बढ़ा और जहाजों की संख्या बढ़ी, वैसे-वैसे जहाजों के लिए लकड़ी की मांग में वृद्धि हुई। ब्रिटिश नौसेना के लिए लकड़ी की आपूर्ति में कमी आ गई। ब्रिटिश जहाज कैसे चल सकते थे? और जहाजों के बिना ब्रिटिश साम्राज्य कैसे सुरक्षित और बनाए रखा जा सकता था? 1820 के दशक में एक जांच आयोग को गंगा के वन संसाधनों का मूल्यांकन करने के लिए भेजा गया। एक दशक के भीतर बड़े पैमाने पर पेड़ काटे जाने लगे और भारी मात्रा में लकड़ी का गंगा से निर्यात होने लगा। 1850 के दशक में रेलवे के आगमन ने लकड़ी के लिए एक नई प्रकार की मांग पैदा कर दी। ब्रिटिश सेना के संचालन और औपनिवेशिक व्यापार के लिए रेलवे अनिवार्य थे। बैलों को चलाने के लिए बांस के जोड़े पर और रेल की पटरियों को जोड़े रखने के लिए “लाग्स” के रूप में लकड़ी की भारी जरूरत थी। एक लंबे स्टीमर जहाज की पाल के लिए 1760-2000 लाग्स की आवश्यकता होती थी। भारत में रेल-वे लाइनों का विस्तार 1860 के दशक से तेजी से बढ़ा। 1890 तक लगभग 25,500 किलोमीटर लंबी रेल लाइनें बिछा चुकी थीं। 1946 में इन लाइनों की लंबाई 7,65,000 किलोमीटर तक पहुंच चुकी थी। रेलवे लाइनों के विस्तार के साथ-साथ बड़े पैमाने पर पेड़ भी काटे गए। मलय प्रायद्वीप में 1850 के दशक में प्रतिवर्ष 35,000 पेड़ लाग्स के लिए काटे गए। सरकार ने आवश्यक मात्रा की आपूर्ति के लिए निजी ठेकेदारों को काम दिया। इन ठेकेदारों ने बिना रुके-थमे पेड़ काटना शुरू कर दिया। रेलवे लाइनों के आस-पास के वन तेजी से वीरान होने लगे।
बागान
औपनिवेशिक सरकार ने चाय, कॉफी और रबड़ के बागानों को बढ़ावा दिया। ये फसलें यूरोप में बड़ी मांग में थीं। यूरोपीय उपनिवेशवादियों को लगा कि बागानों के लिए वनों को काटकर भूमि उपलब्ध कराई जा सकती है। बड़े यूरोपीय बागान मालिकों को वनों की कटाई के लिए सरकार से भूमि मुफ्त या सस्ते दामों पर मिलती थी। ये मालिक मजदूरों को बागानों में काम करने के लिए मजबूर करते थे।
वाणिज्यिक वन पालन का उदय
औपनिवेशिक सरकार को लगा कि वन राजस्व का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं। उन्होंने वनों को वैज्ञानिक प्रबंधन के तहत लाने का फैसला किया। 1864 में भारतीय वन सेवा की स्थापना की गई। 1865 में पहला वन अधिनियम बनाया गया। 1878 के वन अधिनियम के द्वारा जंगल को तीन श्रेणियों में बांटा गया: आरक्षित, संरक्षित और ग्राम वन। आरक्षित वनों में स्थानीय लोगों को प्रवेश करने की अनुमति नहीं थी। वन अधिकारी स्थानीय लोगों पर नियंत्रण रखते थे और उन्हें वन संसाधनों का उपयोग करने से रोकते थे।
वनों के नियमन से खेती कैसे प्रभावित हुई?
घुमंतू खेती, एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका में पारंपरिक खेती का तरीका है, जिसमें जंगल काटकर जलाया जाता है और राख में बीज बोए जाते हैं। यूरोपीय वन रक्षकों ने इसे खतरनाक माना और इसे प्रतिबंधित कर दिया। इससे स्थानीय समुदायों की आजीविका प्रभावित हुई।
वन विद्रोह
वन नियमों के खिलाफ बहुत से विद्रोह हुए। भारत में बस्तर के लोगों ने 1910 में विद्रोह किया। वे वन नियमों, करों और मजदूरी के खिलाफ थे। विद्रोह को दबा दिया गया लेकिन सरकार ने नीतियां बदलीं।
जावा में वन परिवर्तन
जावा में डच उपनिवेशवादियों ने वनों का शोषण किया। उन्होंने सागौन के बागान लगाए। स्थानीय लोग ‘ब्लांडोंगडिएंस्टन’ प्रथा के तहत मजदूरी करने को मजबूर थे। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानियों ने वनों का उपयोग किया। स्वतंत्रता के बाद इंडोनेशियाई सरकार ने वन प्रबंधन में बदलाव किए।
महत्वपूर्ण शब्दावली
- वन-विनाश: वनों के लुप्त होने की प्रक्रिया।
- लाग्स: रेल की पटरियों को जोड़े रखने वाली लकड़ी।
- घुमंतू खेती: जंगल काटकर जलाकर की जाने वाली खेती।
- आरक्षित वन: जहां स्थानीय लोगों को प्रवेश वर्जित।
- बस्तर विद्रोह: 1910 में बस्तर के लोगों का विद्रोह।
- ब्लांडोंगडिएंस्टन: जावा में मजदूरी प्रथा।
महत्वपूर्ण तिथियां
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1600 | भारत में खेती का क्षेत्र कुल भूमि का 1/6 भाग |
| 1864 | भारतीय वन सेवा की स्थापना |
| 1865 | पहला वन अधिनियम |
| 1878 | वनों का तीन श्रेणियों में विभाजन |
| 1910 | बस्तर विद्रोह |
| 1850 | जावा में वाणिज्यिक वन पालन शुरू |
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