आधुनिक विश्व में चरागाह (CH-5) Notes in Hindi || Class 9 SST History Chapter 5 in Hindi ||

पाठ – 5

आधुनिक विश्व में चरागाह

In this post we have given the detailed notes of class 9 SST (History) Chapter 5 आधुनिक विश्व में चरागाह (Pastoralists in the Modern World) in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 9 exams.

इस पोस्ट में कक्षा 9 के सामाजिक विज्ञान (इतिहास) के पाठ 5 आधुनिक विश्व में चरागाह (Pastoralists in the Modern World) के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 9 में है एवं सामाजिक विज्ञान विषय पढ़ रहे है।

BoardCBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board
TextbookNCERT
ClassClass 9
SubjectClass 9 SST (History) Notes in Hindi
Chapter no.Chapter 5
Chapter Nameआधुनिक विश्व में चरागाह (Pastoralists in the Modern World)
CategoryClass 9 SST (History) Notes in Hindi
MediumHindi
Class 9 SST (History) Chapter 5 आधुनिक विश्व में चरागाह (Pastoralists in the Modern World) in Hindi

परिचय

इस अध्याय में आप घुमंतू चरागाहों के बारे में पढ़ेंगे। घुमंतू ऐसे लोग होते हैं जो किसी एक जगह टिक कर नहीं रहते बल्कि रोटी-रोटी के जुगाड़ में यहां से वहां घूमते रहते हैं। देश के कई हिस्सों में हम घुमंतू चरागाहों को अपने जानवरों के साथ आते-जाते देख सकते हैं। चरागाहों की किसी टोली के पास भेड़-बकरियों का रेवड़ या झुंड होता है तो किसी के पास ऊंट या अन्य मवेशी रहते हैं। क्या उन्हें देख कर आपने कभी इस बारे में सोचा है कि वे कहां से आए हैं और कहां जा रहे हैं? क्या आपको पता है कि वे कैसे रहते हैं, उनकी आमदनी के साधन क्या हैं और उनका अतीत क्या था?

चरागाहों को इतिहास की पुस्तकों में विरले ही जगह मिल पाती है। जब भी आप अर्थव्यवस्था के बारे में पढ़ते हैं – फिर चाहे वह इतिहास की कक्षा हो या अर्थशास्त्र की – सिर्फ कृषि और उद्योगों के बारे में ही पढ़ते हैं। कभी-कभी इन कक्षाओं में कारिगरों के बारे में भी पढ़ने को मिल जाता है। लेकिन चरागाहों के बारे में पढ़ने-लिखने को शायद कुछ नहीं मिलता। मानो उनकी जीवन का कोई मतलब ही न हो। अक्सर मान लिया जाता है कि वे ऐसे लोग हैं जिनके लिए आज की आधुनिक दुनिया में कोई जगह नहीं है; जैसे उनका दौर बीत चुका हो।

इस अध्याय में आप देखेंगे कि भारत और अफ्रीका जैसे समाजों में चरागाही का कितना महत्व है। यहां आप जानेंगे कि उपनिवेशवाद ने उनकी जीवन पर कितना गहरा असर डाला है और इन समुदायों ने आधुनिक समाज के दबावों का कैसे सामना किया है। इस भाग में हम पहले भारत और उसके बाद अफ्रीका के चरागाहों की जीवन का अध्ययन करेंगे।

घुमंतू चरागाह और उनकी आवाजाही

जम्मू और कश्मीर के गुज्जर बकरवाल समुदाय के लोग भेड़-बकरियों के बड़े-बड़े रेवड़ रखते हैं। इस समुदाय के अधिकतर लोग अपनी मवेशियों के लिए चरागाहों की तलाश में भटकते-भटकते उन्नीसवीं सदी में यहां आए थे। जैसे-जैसे समय बीतता गया वे यहां के होकर रह गए; यहां बस गए। उसके बाद वे सर्दी-गर्मी के हिसाब से अलग-अलग चरागाहों में जाने लगे। वे जाड़ों में शिवालिक की निचली पहाड़ियों में आकर डेरा डाल लेते हैं। जाड़ों में वे अपने मवेशियों की देखभाल करते हैं और कभी-कभी पड़ोसी गांवों में दूध बेचते हैं। अप्रैल के अंत तक वे उत्तर की तरफ जाने लगते – गर्मियों के चरागाहों के लिए। इस सफर में कई परिवार काफीला बना कर साथ-साथ चलते हैं। वे पीर पंजाल के दरों को पार करते हुए कश्मीर की घाटी में पहुंच जाते हैं। जैसे ही गर्मियां शुरू होतीं, जमीन हुई बर्फ की मोटी चादर पिघलने लगती और चारों तरफ हरियाली छा जाती। इन दिनों में यहां उगने वाली तरह-तरह की घास से मवेशियों का पेट भी भर जाता था और उन्हें सेहतमंद खुराक भी मिल जाती थी। सितंबर के अंत में बकरवाल एक बार फिर अपना बोझा-बिस्तर समेटने लगते। इस बार वे वापस अपनी जाड़ों वाली जगह की तरफ नीचे की ओर चल पड़ते। जब पहाड़ों की चोटियों पर बर्फ जमने लगती तो वे निचली पहाड़ियों की शरण में चल पड़ते।

पास के ही पहाड़ों में चरागाहों का एक और समुदाय रहता था। हिमाचल प्रदेश के इस समुदाय को गद्दी कहते हैं। ये लोग भी मौसमी उतार-चढ़ाव का सामना करने के लिए इसी तरह सर्दी-गर्मी के हिसाब से अपनी जगह बदलते रहते थे। वे भी शिवालिक की निचली पहाड़ियों में अपने मवेशियों को जाड़ों में चराते हुए जाड़ा बिताते थे। अप्रैल आते-आते वे उत्तर की तरफ चल पड़ते और पूरी गर्मियां लाहौल और स्पीति में बिता देते हैं। जब बर्फ पिघलती और ऊंचे दर्रे खुल जाते तो उनमें से बहुत से ऊपरी पहाड़ों में स्थित घास के मैदानों में जा पहुंचते थे। सितंबर तक वे दोबारा वापस चल पड़ते। वापसी में वे लाहौल और स्पीति में रुक कर फसल काटते और सर्दी के लिए चारा इकट्ठा करते थे।

पहाड़ों में

जम्मू और कश्मीर के गुज्जर बकरवाल समुदाय के लोग भेड़-बकरियों के बड़े-बड़े रेवड़ रखते हैं। इस समुदाय के अधिकतर लोग अपनी मवेशियों के लिए चरागाहों की तलाश में भटकते-भटकते उन्नीसवीं सदी में यहां आए थे। जैसे-जैसे समय बीतता गया वे यहां के होकर रह गए; यहां बस गए। उसके बाद वे सर्दी-गर्मी के हिसाब से अलग-अलग चरागाहों में जाने लगे। वे जाड़ों में शिवालिक की निचली पहाड़ियों में आकर डेरा डाल लेते हैं। जाड़ों में वे अपने मवेशियों की देखभाल करते हैं और कभी-कभी पड़ोसी गांवों में दूध बेचते हैं। अप्रैल के अंत तक वे उत्तर की तरफ जाने लगते – गर्मियों के चरागाहों के लिए। इस सफर में कई परिवार काफीला बना कर साथ-साथ चलते हैं। वे पीर पंजाल के दरों को पार करते हुए कश्मीर की घाटी में पहुंच जाते हैं। जैसे ही गर्मियां शुरू होतीं, जमीन हुई बर्फ की मोटी चादर पिघलने लगती और चारों तरफ हरियाली छा जाती। इन दिनों में यहां उगने वाली तरह-तरह की घास से मवेशियों का पेट भी भर जाता था और उन्हें सेहतमंद खुराक भी मिल जाती थी। सितंबर के अंत में बकरवाल एक बार फिर अपना बोझा-बिस्तर समेटने लगते। इस बार वे वापस अपनी जाड़ों वाली जगह की तरफ नीचे की ओर चल पड़ते। जब पहाड़ों की चोटियों पर बर्फ जमने लगती तो वे निचली पहाड़ियों की शरण में चल पड़ते।

पठारों, मैदानों और रेगिस्तानों में

महाराष्ट्र के धनगर चरागाह मैदानी इलाकों में रहते हैं। वे जाड़ों में कोंकण में रहते हैं। कोंकण में उन्हें खेती की फसल के अवशेष मिल जाते हैं। अप्रैल आते-आते वे उत्तर की तरफ चल पड़ते और पूरी गर्मियां पठारों में बिता देते हैं। धनगरों के अलावा कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में गोल्ला, कुरुमा और कुरुबा, राजस्थान में राइका जैसे समुदाय भी हैं।

राइका ऊंट और भेड़-बकरियां पालते हैं। वे राजस्थान के थार रेगिस्तान में रहते हैं। जाड़ों में वे हरियाणा में रहते हैं जहां उन्हें चारा मिल जाता है। गर्मियों में वे सिंधु घाटी की तरफ चल पड़ते हैं।

उपनिवेशिक शासन और चरागाही भूमि

उपनिवेशिक सरकार ने चरागाही भूमि को बंजर मान लिया और उसे कृषि में बदलने की कोशिश की। वन अधिनियमों से चरागाहों पर प्रतिबंध लगाया गया। करों की वृद्धि से चरागाहों की मुश्किलें बढ़ीं।

चरागाह भूमि में बदलाव

उपनिवेशिक सरकार ने चरागाही भूमि को राजस्व बढ़ाने के लिए कृषि भूमि में बदल दिया। चरागाहों को जंगलों में आरक्षित कर दिया गया। सीमाओं से आवाजाही सीमित हो गई।

चरागाहों की जीवन पर असर

चरागाहों की संख्या में कमी आई। मवेशियों की संख्या घट गई। बहुत से चरागाह स्थायी रूप से बस गए या कृषि करने लगे। कुछ ने विद्रोह किया।

अफ्रीका में चरागाह

अफ्रीका में मासाई समुदाय मुख्य चरागाह है। वे केन्या और तंजानिया में रहते हैं। उपनिवेशिक काल में उनकी भूमि को दो भागों में बांट दिया गया। चरागाहों पर प्रतिबंध लगाया गया।

मासाई कहां रहते थे?

मासाई केन्या और तंजानिया के घास के मैदानों में रहते हैं। वे मवेशी पालते हैं और घुमंतू हैं।

सीमाओं का बंद होना

उपनिवेशिक सरकार ने मासाई भूमि को सफेद बस्तियों के लिए ले लिया। राष्ट्रीय उद्यान बनाए गए। मासाई को छोटे क्षेत्रों में सीमित कर दिया गया।

जब चरागाह सूख जाते हैं

सूखे के समय मासाई मवेशियों की मौत से प्रभावित होते हैं। वे अन्य समुदायों से मदद लेते हैं।

सभी चरागाह समान नहीं

अफ्रीका में चरागाहों में गरीब और अमीर का अंतर बढ़ा। अमीर चरागाहों ने अपनी स्थिति बनाए रखी जबकि गरीब मजदूरी करने लगे।

सीमाओं के बाद

स्वतंत्रता के बाद भी मासाई की समस्याएं जारी रहीं। सरकार ने उनकी भूमि पर नियंत्रण रखा।

महत्वपूर्ण शब्दावली

  • घुमंतू चरागाह: जो एक जगह टिक कर नहीं रहते, मवेशी चराने के लिए घूमते हैं।
  • बुग्याल: हिमालय के ऊंचे चरागाह।
  • धनगर: महाराष्ट्र के चरागाह।
  • राइका: राजस्थान के चरागाह।
  • मासाई: अफ्रीका के चरागाह।
  • क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट: 1871 का कानून जो चरागाहों को अपराधी मानता था।

महत्वपूर्ण तिथियां

वर्ष घटना
1850 गुज्जर बकरवालों का वर्णन
1871 क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट
1880-1920 चरागाही भूमि में कमी
1910 बस्तर विद्रोह जैसा चरागाही विद्रोह
1950 अफ्रीका में स्वतंत्रता, लेकिन चरागाहों की समस्या जारी

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